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07 मार्च: गोविन्द बल्लभ पन्त पुण्यतिथि: उपलब्धियों से भरा रहा गोविन्द बल्लभ पन्त का जीवन, जाने उनसे जुड़ी रोचक बातें

आज दिनांक 07 मार्च 2026 है। आज पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और वरिष्ठ भारतीय राजनेता की पुण्यतिथि है। गोविन्द बल्लभ पन्त न सिर्फ एक महान राजनीतिज्ञ थे, बल्कि एक जांबाज़ स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

अल्मोड़ा जिले के खूंट गाँव में हुआ था जन्म-

गोविन्द बल्लभ पन्त का जन्म 10 सितम्बर 1887 को अल्मोड़ा जिले के श्यामली पर्वतीय क्षेत्र स्थित गांव खूंट में महा राष्ट्रीय मूल के एक ब्राह्मण के घर हुआ था। पंत मूलतः महाराष्ट्र के थे। उनकी मां का नाम गोविंदी बाई था, उनके नाम से ही पंत को अपना नाम मिला था। पिता की सरकारी नौकरी और हर साल तबादले के कारण गोविंद बल्लभ पंत का लालन-पालन उनके नाना बद्रीदत्त जोशी के यहां हुआ। उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक विचारों पर उनके नाना का गहरा प्रभाव था। गोविंद बल्लभ पंत 1905 में वे अल्मोड़ा से इलाहाबाद आ गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की और काशीपुर में वकालत शुरू कर दी। इनके बारे में कहा जाता था कि पंत सिर्फ सच्चे केस ही लेते थे और झूठ बोलने पर केस छोड़ देते थे। उन्होंने काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और काकोरी मामले में शामिल अन्य क्रांतिकारियों के मुकदमे की पैरवी भी की थी।

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ फूंका बिगुल-

गोविंद बल्लभ पंत ने 1914 से ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। इसके तहत उन्होंने कुली बेगार सिस्टम हटवाया। इस सिस्टम या कानून के तहत आम लोगों को अंग्रेजों का सामान कुली की तरह ढोना पड़ता था, लेकिन पंत ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई और उसे खत्म करके ही दम लिया। 1921 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत की विधानसभा के लिए चुने गए। 1930 में उन्होंने महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और कई हफ्तों तक जेल में रहना पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने साइमन कमीशन के बहिष्कार में भी हिस्सा लिया था। नमक सत्याग्रह के अलावा पंत को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल में रहना पड़ा। मार्च 1945 तक वह कांग्रेस कमिटी के अन्य सदस्यों के साथ अहमदनगर किले में तीन साल तक रहे। इस दौरान उनका स्वास्थ्य भी दिनोंदिन गिरता जा रहा था, जिसे देखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें रिहा करने की अपील की। 1937 से 1939 तक उन्होंने ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला। संयुक्त प्रांत में 1946 के चुनावों में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया। वे 1946 से 1947 तक संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री रहे। देश के आजाद होने के बाद पंत 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। फिर 1955 में पंत केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेने के लिए लखनऊ से नई दिल्ली आ गए। वे 1955 से 1961 तक गृहमंत्री के पद पर कार्यरत थे। गृहमंत्री के रूप में उनका मुख्य योगदान भारत को भाषा के अनुसार राज्यों में विभक्त करना तथा हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था। सन 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि ‘भारतरत्न’ से विभूषित किया गया।

हृदयाघात से हुआ निधन-

7 मार्च 1961को हृदयाघात से जूझते हुए उनकी मृत्यु हो गयी। उस समय वे भारत सरकार में केन्द्रीय गृहमंत्री थे।

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