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अल्मोड़ा: अदालत का फैसला, इतने लाख की ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले में दो आरोपी साक्ष्य के अभाव में हुए बरी

अल्मोड़ा: अल्मोड़ा की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने ₹1,83,004 (एक लाख तिरासी हजार चार रुपये) की कथित ऑनलाइन धोखाधड़ी और एटीएम क्लोनिंग के बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाया है और‌ दोनों मुख्य अभियुक्तों नवनीत शुक्ला और शरद मिश्रा, को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट नवल सिंह बिष्ट की अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा ठोस साक्ष्य और प्रक्रियात्मक नियमों का पालन न कर पाने के कारण दोनों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया। अभियुक्तों की ओर से विद्वान अधिवक्ता मो० इमरोज़ ने पैरवी की।

जानेंक्या था पूरा मामला

यह मामला वर्ष 2017 का है, जब अल्मोड़ा निवासी किरन साह ने कोतवाली अल्मोड़ा में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक, 29 और 30 अक्टूबर 2017 के दौरान उनके और उनके पति के संयुक्त भारतीय स्टेट बैंक (SBI) खाते से धोखे से कुल ₹1,83,004 की राशि गायब कर दी गई थी। इस दौरान एटीएम से पैसे निकालने, अन्य खातों में पैसे ट्रांसफर करने और ऑनलाइन खरीदारी (दिल्ली में काजू खरीद और टूरिज्म ट्रांसफर आदि) के माध्यम से पैसे निकाले गए थे। पुलिस ने जांच के बाद दावा किया था कि गिरोह ने एटीएम में मदद करने के बहाने स्किमिंग डिवाइस के जरिए कार्ड का डेटा चुराकर एटीएम का क्लोन तैयार किया था। इस आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 420 तथा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66 व 66(ग) के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

किया गया था यह दावा

इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि पुलिस जांच में जिस स्किमिंग डिवाइस से एटीएम क्लोन करने का दावा किया गया था, उसे पुलिस बरामद ही नहीं कर सकी। न ही कथित क्लोन एटीएम कार्ड को अदालत में जांच के लिए पेश किया गया। बैंक अधिकारियों और पुलिस द्वारा पेश की गई सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) और सीडीआर (CDR) को प्रमाणित करने के लिए कानूनन जरूरी धारा 65B (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) का वैध प्रमाण पत्र पेश नहीं किया जा सका। बैंक अधिकारियों ने स्वीकार किया कि फुटेज थर्ड-पार्टी वेंडर द्वारा दी गई थी और उन्होंने स्वयं उसे चलाकर नहीं देखा था।अदालत ने पाया कि मुख्य गवाहों द्वारा आरोपियों की कानूनन टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई थी। पुलिस ने दोनों आरोपियों को मुख्य रूप से एक अन्य गिरफ्तार आरोपी राहुल त्रिपाठी के हिरासत में दिए गए बयान के आधार पर नामजद किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25, 26 और 30 के तहत पुलिस हिरासत में सह-आरोपी द्वारा दिया गया बयान तब तक मान्य नहीं होता जब तक कि उससे संबंधित स्वतंत्र भौतिक साक्ष्य (बरामदगी) न हो।

अदालत का आदेश

समस्त साक्ष्यों की विवेचना करने के पश्चात अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को ‘संदेह से परे’ साबित करने में पूरी तरह असफल रहा है। इसके चलते अदालत ने नवनीत शुक्ला और शरद मिश्रा को आईपीसी 420 और आईटी एक्ट की धाराओं से पूर्णतः बरी कर दिया।

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