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अल्मोड़ा/हल्द्वानी: दशकों का इंतज़ार खत्म: BSF के दो कुमाऊंनी जांबाजों को 30 साल बाद मिला बलिदान का आधिकारिक दर्जा, परिवारों को सौंपा प्रमाणपत्र

​हल्द्वानी: देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीरों के परिवारों के लिए दशकों पुराना इंतज़ार आख़िरकार समाप्त हो गया है।

किया सम्मानित

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्षों की निरंतर कोशिशों के बाद सीमा सुरक्षा बल (BSF) महानिदेशालय, नई दिल्ली ने कुमाऊं के दो बलिदानी वीरों के सर्वोच्च बलिदान को आधिकारिक पहचान दी है। BSF अधिकारियों ने घर पहुँचकर स्वजनों को ‘ऑपरेशनल कैजुअल्टी’ (बलिदान) प्रमाणपत्र सौंपा, तो परिजनों की आँखें भावुकता से छलक पड़ीं।


​29 साल बाद नायक ध्यान सिंह के बलिदान को सम्मान

​पिथौरागढ़ ज़िले की डीडीहाट तहसील अंतर्गत हाट थर्प गाँव के निवासी नायक (सामान्य ड्यूटी) ध्यान सिंह 7 मार्च 1981 को BSF में भर्ती हुए थे। 9 अक्टूबर 1996 को जम्मू-कश्मीर के बांदीपुर स्थित भारत-पाक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LoC) पर 135वीं बटालियन के साथ तैनात रहने के दौरान उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।‌ लंबी कागज़ी कार्रवाई और कवायद के बाद अब पूरे 29 वर्षों बाद उनके बलिदान को आधिकारिक दर्जा और पहचान मिल सकी है।

​32 साल बाद मुख्य आरक्षक हीरा बल्लभ जोशी के परिवार को मिला सम्मान

​अल्मोड़ा ज़िले के मेहला गाँव (पोस्ट भगतोला) निवासी मुख्य आरक्षक हीरा बल्लभ जोशी 23 अप्रैल 1969 को सीमा सुरक्षा बल में शामिल हुए थे। 13 सितंबर 1994 को कश्मीर घाटी के अनंतनाग क्षेत्र में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ तलाशी अभियान के दौरान हुई भीषण मुठभेड़ में वे वीरगति को प्राप्त हो गए थे। ​पूरे 32 साल बाद BSF की 94वीं बटालियन के उप कमांडेंट योगेश कुमार ने हल्द्वानी स्थित उनके आवास पर पहुँचकर दिवंगत वीर की पत्नी पार्वती जोशी को आधिकारिक ‘ऑपरेशनल कैजुअल्टी’ प्रमाणपत्र सौंपा। पति के बलिदान की आधिकारिक पहचान पाते ही पार्वती जोशी भावुक हो गईं।
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