अल्मोड़ा: परम्परागत खेती के साथ रेशम कीटपालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाकर विकासखण्ड धौलादेवी के ग्राम बमनस्वाल निवासी प्रगतिशील कृषक हरीश जोशी ने अपनी आय बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
हासिल की यह उपलब्धि
वहीं सीमित भूमि और संसाधनों के बावजूद रेशम कीटपालन से प्राप्त अतिरिक्त आय ने उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। हरीश जोशी पूर्व में गेहूँ, धान एवं सब्जियों की परम्परागत खेती करते थे। छोटी जोत एवं कृषि लागत अधिक होने के कारण वर्षभर की मेहनत के बावजूद लगभग 30 से 40 हजार रुपये की ही बचत हो पाती थी। वर्ष 2017-18 में ग्राम पंचायत भवन में रेशम विभाग द्वारा आयोजित जागरूकता गोष्ठी में उन्हें शहतूत की खेती के साथ रेशम कीटपालन की जानकारी मिली। विभागीय अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर उन्होंने रेशम कीटपालन को अपनाने का निर्णय लिया।
प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हरीश जोशी ने लगभग एक एकड़ भूमि में शहतूत की एस-146 प्रजाति का रोपण कर करीब 30 डीएफएल से रेशम कीटपालन शुरू किया। रेशम कीटपालन से प्राप्त बेहतर परिणामों के बाद उन्होंने इस कार्य का विस्तार किया। वर्ष 2026-27 में उनके द्वारा लगभग 4.5 एकड़ क्षेत्र में टी-5 प्रजाति के करीब 5,000 शहतूत पौधों का रोपण किया गया तथा कीटपालन को बढ़ाकर लगभग 50 डीएफएल कर दिया गया। रेशम विकास विभाग द्वारा हरीश जोशी को 03 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण, शहतूत के पौधे, 90 प्रतिशत अनुदान, कीटपालन उपकरण एवं कृषि उपकरण उपलब्ध कराए गए। इसके साथ ही विभागीय वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया।
अन्य लोगों के लिए प्रेरणा
उन्होंने अपनी पहली फसल में ही लगभग ’’25 किलोग्राम रेशम कोकून का उत्पादन’’ किया, जिसकी बाजार कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम रही। वर्तमान में रेशम कीटपालन से उन्हें वर्ष में दो फसलों के माध्यम से लगभग ’’25 हजार रुपये की अतिरिक्त आय’’ प्राप्त हो रही है। इनकी सफलता से प्रेरित होकर ग्राम बमनस्वाल के 34 अन्य किसान भी रेशम कीटपालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपना चुके हैं। इससे गांव में स्वरोजगार एवं अतिरिक्त आय के नए अवसर विकसित हुए हैं। हरीश जोशी ने रेशम विकास विभाग का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विभागीय प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन से उन्हें आय का नया स्रोत मिला है। उन्होंने अन्य छोटे एवं सीमांत किसानों से भी परम्परागत खेती के साथ रेशम कीटपालन जैसे सहायक व्यवसाय को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि कम भूमि, कम पानी एवं अपेक्षाकृत कम लागत में रेशम कीटपालन से अच्छी अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है। हरीश जोशी की सफलता इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि ’’परम्परागत कृषि के साथ कृषि आधारित सहायक गतिविधियों को अपनाकर छोटे एवं सीमांत किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।