अल्मोड़ा में गर्मी का सीजन आते ही बाजार में पहाड़ी फल काफल भी दिखने लगते है। यह रसीला फल लोगों की पहली पसंद बन जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों के जंगलों का खट्टा-मीठा रसीला फल काफल काफी पसंद किया जाता है।
समय से पहले पकने लगे
मार्च का महीना चल रहा है। जिसमें काफल खिल गए हैं। उत्तराखंड में इस वर्ष जलवायु परिवर्तन और बेमौसम गर्मी के कारण काफल (हिमालयन बेरी) समय से पहले, यानी फरवरी-मार्च में ही पककर तैयार हो गए हैं। आमतौर पर यह अप्रैल-मई में पकते हैं। मार्च के पहले सप्ताह में ही काफल पककर बाज़ारों में बिकने के लिए आ गया है। यह घटना ग्लोबल वार्मिंग और सर्दियों में बारिश/बर्फबारी की कमी के कारण हो रही है, जो इकोसिस्टम के लिए भी चिंताजनक है।
रसीला फल काफल
काफल तीन महीने तक स्थानीय बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का भी साधन बनता है। काफल का वैज्ञानिक नाम मिरिका एक्सकुलेंटा है, जो हिमालय के निचले क्षेत्रों व उच्च पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। गर्मी के दिनों में होने वाला यह फल देश-विदेश में काफी प्रसिद्ध है। इसके पेड़ की छाल का प्रयोग चर्मशोधन के लिए किया जाता है। गर्मी के मौसम मेें ये फल थकान दूर करने के साथ ही तमाम औषधीय गुणों से भरपूर है।