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अल्मोड़ा: जंगलों को आग से बचाने, जल स्रोत संरक्षण और जल पुनर्भरण विषय पर पर्यावरण संस्थान कटारमल में हुई चर्चा

गोविन्द बल्लभ पन्त राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी कटारमल, अल्मोड़ा में बीते बुधवार  को जंगलों को आग से बचाने, जल स्रोत संरक्षण और जल पुनर्भरण विषय पर हुई बैठक में चर्चा की गयी ।  इस बैठक में संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल, स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत के सलाहकार गजेन्द्र पाठक, समिति के सदस्यों, पर्यावरण संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. जी.सी.एस. नेगी, संस्थान के जैव विविधता संरक्षण एवं प्रबंधन केंद्र के प्रमुख डा. आई.डी. भट्ट, तथा वैज्ञानिक डा. सतीश चन्द्र आर्य तथा डा. आशीष पाण्डेय ने भाग लिया ।

प्रतिवर्ष जंगलों में लगने वाली आग से जैव विविधता तथा पूरे पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचती

बैठक का शुभारम्भ पर संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत से आये सभी सदस्यों का स्वागत किया तथा उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की ।  बैठक में स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत के सलाहकार  गजेन्द्र पाठक ने समिति के द्वारा शीतलाखेत में जंगल बचाओ-जीवन बचाओ मुहिम के अंतर्गत जंगलों को आग से बचाने तथा जल संरक्षण तथा जल पुनर्भरण हेतु समिति द्वारा किये जा रहे कार्यों से संस्थान के निदेशक तथा वैज्ञानिकों को परिचित करवाया ।  उन्होंने कहा कि प्रतिवर्ष जंगलों में लगने वाली आग से जैव विविधता तथा पूरे पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचती है तथा इससे जानमाल का भारी नुकसान भी होता है ।

एक अप्रैल को औंदिवस’ के रूप में मनाने का सुझाव

उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब वर्षा तथा हिमपात कम होता है जिस कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं ।  कुमाऊं की परंपरागत औं जलन पद्धति भी जंगलों की आग में बढ़ोतरी हेतु जिम्मेदार है तथा इसे व्यवस्थित करने की आवश्यकता है ।  उन्होंने प्रत्येक वर्ष एक अप्रैल को ‘औंदिवस’ के रूप में मनाने का सुझाव भी दिया ताकि जंगलों को आग से बचाया जा सके ।

वनाग्नि रोकथाम में महिलाओं की भागीदारी का विशेष महत्त्व

उन्होंने  वनाग्नि रोकथाम में महिलाओं की भागीदारी के महत्त्व को समझाया तथा इस हेतु समिति के प्रयासों की चर्चा की ।  उन्होंने वनों के पुनरुद्धार हेतु पौधारोपण पद्धति के बजाये असिस्टेट नेचुरल रीजेनेरेशन पद्धति को अपनाने की बात कही तथा यह भी बताया कि उनके द्वारा इसी पद्धति से उनकी समिति ने शीतलाखेत में वनों के पुनरुद्धार करने में सफलता पायी है।  उन्होंने जल संरक्षण तथा जल पुनर्भरण विषय पर भी अपने विचार रखे ।  बैठक में समिति के अन्य सदस्यों ने भी वनाग्नि, जल संरक्षण तथा जल पुनर्भरण, महिलाओं की भागीदारी आदि मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किये ।

प्रो. सुनील नौटियाल ने स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत के द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की

पर्यावरण संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत के द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की और कहा कि संस्था उनके साथ मिल कर इस विषय पर कार्य करेगा ।  उन्होंने कहा कि जंगलों की आग से होने वाले नुकसान तथा वन सम्पदा की अवनति का मूल्यांकन करने की आवश्कता है ।  संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. जी. सी. एस. नेगी तथा डा. आई.डी. भट्ट ने इस विषय पर पूर्व में संस्थान द्वारा किये जा रहे कार्यों के बारे में समिति के सदस्यों को बताया और इस विषय पर विभिन्न वैज्ञानिक पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किये ।

चीड़ और बांज के वनों के पारिस्थिकीय तथा अन्य वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में स्याही देवी विकास समिति के सदस्यों को दी गयी  जानकारी

  उन्होंने चीड़ और बांज के वनों के पारिस्थिकीय तथा अन्य वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में स्याही देवी विकास समिति के सदस्यों को जानकारी दी तथा कहा कि इस विषय पर पुनः चर्चा किये जाने की आवश्यकता है । स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत के सलाहकार  गजेन्द्र पाठक ने पर्यावरण संस्थान के निदेशक तथा वैज्ञानिकों से शीतलाखेत आकर समिति के द्वारा किये गए कार्यों को देखने हेतु शीतलाखेत आने का आमंत्रण दिया ।  इस अवसर पर स्याही देवी विकास समिति द्वारा संस्थान को स्मृति भेंट के रूप में विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान द्वारा विकसित एक वीएल स्याही लौह हल प्रदान किया गया   ।

भविष्य में मिल कर कार्य करने का आश्वासन दिया

बैठक के अंत में संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत से आये सभी सदस्यों का आभार प्रकट किया तथा भविष्य में मिल कर कार्य करने का आश्वासन दिया ।

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