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24 फरवरी: आज से शुरू हो रहा है होलाष्टक, नहीं होते शुभ-मांगलिक कार्य, इस दौरान भूलकर भी न करें यह काम

आज 24 फरवरी 2026 है। आज से होलाष्टक शुरू हो रहा है। आज से होलाष्टक लग रहा है। होली से आठ दिन पहले होलाष्टक लगा जाता है। होली हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन यानी चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि के दिन होली खेली जाती है। हिंदू धर्म में होलाष्टक को अशुभ समय माना गया है। इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। 24 फरवरी से शुरू होने वाले इन आठ दिनों को आत्मचिंतन और साधना का समय माना गया है। इस साल होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी 2026 से होगी। वहीं, होलाष्टक का समापन 3 मार्च 2026 को होगा।

जानें शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि 24 फरवरी को सुबह 7 बजकर 1 मिनट से शुरू होगी और 25 फरवरी शाम 4 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। यानी 24 फरवरी से ही होलाष्टक की शुरुआत मानी जाएगी। यह अवधि होलिका दहन तक चलेगी और पूर्णिमा के दिन समाप्त होगी। होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं, जिसके कारण शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिल पाता है। इस साल होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी 2026 से होगी। वहीं, होलाष्टक का समापन 3 मार्च 2026 को होगा।

होलाष्टक लगने पर न करे यह काम

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मिली जानकारी के अनुसार इस दौरान शुभ काम न करें
📌📌होलाष्टक में शादी-विवाह और सगाई जैसे मांगलिक कार्यों के अलावा मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार नहीं करने चाहिए।
📌📌होलाष्टक में भवन निर्माण, वाहन, प्लॉट या किसी प्रॉपर्टी को खरीदना या बेचना वर्जित है।
📌📌होलाष्टक में भूलकर भी यज्ञ और हवन जैसे कार्य ना करें।
📌📌होलाष्टक में शुभ कार्यों की शुरुआत बिल्कुल न करें। अगर आप किसी नई दुकान का शुभारंभ करने वाले हैं तो होलाष्टक से पहले या बाद में करें।
📌📌होलाष्टक में सोने या चांदी के आभूषण खरीदने से बचें। आप होलाष्टक से पहले या बाद में इन्हें खरीद सकते हैं।

जाने क्यो लगता है होलाष्टक

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार प्रेम के देवता कामदेव ने भोलेनाथ की तपस्या भंग कर दी थी। इससे नाराज होकर भगवान शिव ने कामदेव को फाल्गुन अष्टमी के दिन भस्म कर दिया था। जब कामदेव की पत्नी रति ने शिवजी की उपासना की और कामदेव को फिर से जीवित करने की प्रार्थना की, तब शिवजी को उस पर दया आई। इसके बाद शिवजी ने कामदेव में फिर से प्राण भर दिए। कहते हैं कि तभी से होलाष्टक मनाने की परंपरा चली आ रही है। कहा जाता है कि होलिका दहन के साथ ही होलाष्टक का अंत हो जाता है।

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