October 22, 2021

आज से हिन्दू नववर्ष व चैत्र नवरात्रि का आरंभ, नवदुर्गा के आगमन और गुड़ी के त्योहार से सजता है नववर्ष।

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आज से चैत्र नवरात्रि का पर्व शुरू हो रहा है। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है। पुराणों में एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ के महीनों में कुल मिलाकर चार बार नवरात्रों का जिक्र किया गया है, लेकिन चैत्र और अश्विन माह के नवरात्रों को ही खासतौर से मनाया जाता है। नवरात्र के दौरान देवी दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा की संज्ञा दी गई है।

हिन्दू पंचाग के अनुसार इस 13 अप्रैल से प्रारंभ होकर चैत्र नवरात्रि 22 अप्रैल को दसवीं के दिन होगी समाप्त,

हिंदू पंचांग के गणना के अनुसार, आज से प्रतिपदा है और इसी दिन से चैत्र नवरात्रि प्रारंभ हो रही है। 13 अप्रैल से प्रारंभ होकर चैत्र नवरात्रि 22 अप्रैल को समाप्त हो जाएगी। नवरात्रि 22 अप्रैल को दशमी के दिन समाप्रंपराओं होगी। हिन्दू परंपराओं के अनुसार, नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना से होती है। नवरात्रि के लिए घटस्थापना विधिवत शुरुआत माना जाता है। जानकार बताते हैं कि घटस्थापना या कलश स्थापना शुभ मुहूर्त पर करना चाहिए। इसी के साथ नवरात्रि की पूजा के लिए कुछ नियमों का पालन भी करना चाहिए। नवरात्रि के पहले ही दिन अखंड ज्योत जलाई जाती है जिसे लग्न के अनुसार प्रज्जवलित किया जाता है।

नौदुर्गा के आगमन से सजता है नववर्ष-

शक्ति की आराधना के पर्व चैत्र नवरात्र की शुरुआत आज से हो रही है। इस दौरान श्रद्धालु घर में घट स्थापना करेंगे। अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाएगी। कोरोना महामारी को देखते हुए लोग घरों में ही अनुष्ठान करेंगे। मंदिरों में सिर्फ पुजारियों को ही पूजन की अनुमति प्रदान की गई है। इस नौ दिनी त्योहार के पहले दिन मंगलवार को भक्त माता शैलपुत्री की आराधना करेंगे।

चैत्र नवरात्रि में घटस्थापना के नियम-

नवरात्रि के पहले दिन श्रद्धालुओं को घट स्थापित करने के बाद अखंड ज्योति अवश्य प्रज्वलित करनी चाहिए तथा ज्वारे भी स्थापित करना चाहिए। परंपराओं के अनुसार, घट स्थापित करके ही देवी पूजन किया जाता है। ‌ जानकार बताते हैं कि देवी पूजन के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से फल दोगुना बढ़ जाता है। नवरात्रि के प्रत्येक 9 दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना बेहद फायदेमंद माना जाता है। अगर आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हैं तो आप नवार्ण मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। नवरात्रि का समापन पूर्णाहुति हवन तथा कन्या भोज के साथ होता है। आप नवार्ण मंत्र, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र तथा दुर्गाअष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र के साथ भी पूर्णाहुति हवन को संपन्न कर सकते हैं। अगर आप अखंड ज्योति प्रज्वलित कर रहे हैं तो कलावा यह मौली का उपयोग हमेशा करें। अखंड ज्योति प्रज्वलित करते समय लग्न पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

चैत्र नवरात्रि व्रत का महत्व

साल में चार बार नवरात्रि आती है। आषाढ़ और माघ में आने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्र होते हैं जबकि चैत्र और अश्विन प्रगट नवरात्रि होती हैं। चैत्र के ये नवरात्र पहले प्रगट नवरात्र होते हैं। चैत्र नवरात्र से हिंदू वर्ष की शुरुआत भी होती है। वहीं शारदीय नवरात्र के दौरान दशहरा मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों को बेहद पवित्र माना जाता है। इस दौरान लोग देवी के नौ रूपों की आराधना कर उनसे आशीर्वाद मांगते हैं। मान्‍यता है कि इन नौ दिनों में जो भी सच्‍चे मन से मां दुर्गा की पूजा करता है उसकी सभी इच्‍छाएं पूर्ण होती हैं।

चैत्र नवरात्रि पूजा-विधि

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा की पूजा से पहले साधक को स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।

इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर गंगाजल डालकर उसे शुद्ध करना चाहिए और उस पर लाल रंग का वस्त्र बिछाना चाहिए।

इसके बाद चावल का अष्टदल कमल बनाएं और मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

मूर्ति स्थापित करने के बाद अष्टदल कमल पर कलश स्थापित करें और उस पर मौली बांधे।

इसके साथ ही कलश पर भी तिलक करें और अखंड दीपक प्रज्वल्लित करें फिर फूल से जल लेकर प्रतिमा और कलश पर जल छिड़कें।

कलश स्थापना शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

नवरात्रि पूजा में कलश स्थापना और कन्या पूजा का विशेष महत्व होता है।

मिट्टी से बनाए गए वेदी पर कलश स्थापना की जाती है।

वेदी पर जौ और गेंहू बो दें और उस पर मिट्टी या तांबे का कलश विधिपूर्वक स्थापित कर दें।

इसके बाद वहां गणेश जी, नौ ग्रह, आदि को स्थापित करें तथा कलश पर मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें।

इसके बाद आप श्रीदुर्गासप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

अब आप प्रत्येक दिन के आधार पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों रोज विधि-विधान से पूजा करें।

शुभ मुहूर्त-

अभिजित मुहूर्त :- सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक

मेष लग्न (चर लग्न) :- सुबह 6 बजकर 02 मिनट से 7 बजकर 38 मिनट तक

वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) :- सुबह 7 बजकर 38 मिनट से 9 बजकर 34 मिनट तक

सिंह लग्न (स्थिर लग्न) :- दोपहर 2 बजकर 7 मिनट से 4 बजकर 25 मिनट तक

कोयल गाती है नववर्ष का मल्हार-

इस अवसर पर कोयल अपनी मधुर ध्वनि से पूरे वातावरण को सम्मोहित करती है। इस अवसर पर कोयल नववर्ष का मल्हार गाती है।

कोरोना महामारी के कारण नियमों का पालन होगा अनिवार्य-

राजधानी भले ही कोरोना के कारण कर्फ्यू के साये में है, लेकिन माता रानी के भक्तों में नवरात्र पर्व को लेकर उमंग है। मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की गई है। हालांकि कोविड-19 को देखते हुए मंदिरों में सिर्फ पुजारियों को ही पूजन की अनुमति मिली हुई है। इसी के साथ माँ के मंदिरों में प्रवेश के लिए कोरोना की गाइडलाइन का पालन करना अनिवार्य होगा।

गुड़ी के त्योहार से खिलता है नववर्ष-

गुड़ी के त्योहार से खिलता है नववर्ष। हर जगह नये साल के जश्न जैसा माहौल बना रहता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, उगादी के त्योहार को हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है-

दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में वैसे तो सालभर में कई पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें से उगादी का विशेष महत्व बताया जाता है। उगादी को इन राज्यों में नए साल के जश्न के तौर पर मनाया जाता है और इसे तेलुगु नव वर्ष भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, उगादी के त्योहार को हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है और यह पावन तिथि आज (13 अप्रैल 2021) है।

उगादी का पर्व किसानों की नई फसल का होता है प्रतीक-

यह पर्व किसानों के लिए नई फसल के आगमन की खुशी का भी प्रतीक  होता है। जिसमें किसानों की नई खिलखिलाती फसल के आगमन की शुरुआत होती है।

पौराणिक मान्यता-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा  ने सृष्टि की रचना की थी और सूर्य की पहली किरण की उत्पत्ति भी इसी दिन हुई थी। यहां तक कि कई स्थानों पर इस त्योहार को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के राज्याभिषेक के तौर पर भी मनाया जाता है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष का त्योहार देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में उगादी यानी तेलुगु नव वर्ष को बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके साथ एक-दूसरे को बधाई भी दी जाती है।

सादगी से घरों में मनाएंगे गुड़ी पड़वा

चैत्र प्रतिपदा के दिन मंगलवार को महाराष्ट्रियन समाज के लोग परंपरागत त्योहार गुड़ी पड़वा को अपने-अपने घर में सादगी के मनाएंगे। कोरोना संक्रमण को देखते हुए मंदिरों में आयोजन नहीं होगा।

कैसे बनाते हैं गुड़ी

एक बांस के ऊपर रेशमी वस्त्र, साड़ी बांधी जाती है। नीम की पत्ती, फूलों का हार पहनाया जाता है। बांस के सिरे पर ऊपर धातु का उल्टा कलश लगाया जाता है। इसे गुड़ी कहा जाता है। नव वर्ष में पंचांग की पूजा की जाती है। श्रीखंड और पूरन पुरी का भोग लगाया जाता है। जोशी ने बताया कि कारोना संक्रमण को देखते हुए मंदिरों में कोई भी आयोजन नहीं रखा गया है।