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उत्तराखंड: अटूट आस्था के आगे बेबस हुए सरकारी दांव-पेच: बिना सुविधाओं के भी नंदा भक्तों ने होमकुंड पहुंचकर रचा नया इतिहास

हरेंद्र बिष्ट की विशेष रिपोर्ट
थराली/नंदाधाम कुरूड़ (चमोली): ना तो सरकार की मंशानुरूप यात्रा रुकी और ना ही ‘नंदा राजजात समिति’ के झंडाबरदारों की हठधर्मिता काम आई। चली तो केवल उन हजारों नंदा भक्तों की ‘अटूट आस्था’, जिन्हें राजनीति और आर्थिक लाभ से परे बस एक ही मुराद थी—12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद अपनी आराध्य मां नंदा को कैलाश विदा करने का साक्षी बनना।

मां नंदा को‌ कैलाश विदाई

भक्तों की इस दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे सरकारी असहयोग और सभी बाधाएं गौण साबित हुईं तथा ‘श्री नंदादेवी बड़ीजात यात्रा 2026’ सफलता और आस्था की नई मिसाल कायम कर अंतिम पड़ावों पर पहुंच चुकी है। इस वर्ष की बड़ीजात यात्रा इस मायने में ऐतिहासिक रही कि श्रद्धालुओं ने बिना किसी बाह्य या सरकारी सहयोग के मीलों लंबे दुर्गम रास्तों, नालों और गदेरों को पार किया। गैरोलीपातल, वेदनी बुग्याल, पातरनचौनिया, कैलवाबिनायक और बगुवावासा जैसे निर्जन पड़ावों में ना रहने-खाने की व्यवस्था थी, ना पानी और ना ही चिकित्सा सुविधाएं। इसके बावजूद, देवी जयकारों के साथ श्रद्धालुओं का कारवां आगे बढ़ता रहा और यात्रियों ने अंतिम लक्ष्य ‘होमकुंड’ पहुंचकर मां नंदा को कैलाश विदाई दी।


​दशकों बाद मिला ऐसा ‘खुशगवार मौसम’, बरसी कृपा

​यात्रा से लौटे श्रद्धालुओं का कहना है कि यह मां नंदा का ही चमत्कार था कि इस बार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बेहद अनुकूल और खुशगवार मौसम मिला। इससे पूर्व वर्ष 1987, 2000 और 2014 की राजजात यात्राओं के दौरान श्रद्धालुओं को भारी बर्फबारी और विपरीत मौसम का सामना करना पड़ा था। इस बार खुले मौसम ने दुर्गम रास्तों के बावजूद यात्रियों के उत्साह और रोमांचित भाव को दोगुना कर दिया।


​2026 से 2027 टालने पर उठे सवाल

​उल्लेखनीय है कि पिछले दो-तीन वर्षों से राज्य सरकार और नंदा राजजात कमेटी नौटी ने इसे ‘हिमालयी सचल महाकुंभ’ के रूप में आयोजित करने का भारी प्रचार-प्रसार किया था। हालांकि, इस साल बसंत पंचमी (23 जनवरी) को ‘दिन पट्टा’ जारी होने से ठीक पहले, समिति और सरकार ने मलमास और मौसम का हवाला देते हुए यात्रा को 2027 तक के लिए स्थगित करने का एकतरफा फैसला सुना दिया। भक्तों के अनुनय-विनय के बावजूद सरकार और समिति अपनी जिद पर अड़ी रही। सिद्धपीठ कुरूड़ से ‘श्री नंदादेवी बड़ीजात समिति (पंजीकृत)’ द्वारा यात्रा शुरू करने के बावजूद सरकार ने इसे हल्के में लिया। कूटनीतिक दबाव बनाकर गढ़वाल-कुमाऊं की कई देवडोलियों और सम्मानित परगना बधाण की राजराजेश्वरी नंदा देवी की डोली को होमकुंड जाने से रोक दिया गया (जिसे वेदनी से ही देवराड़ा लौटा दिया गया)। इसके बावजूद दशोली, बण्ड़ और ज्वाल्पा की डोलियों, सैकड़ों छतोलियों और चौसिंगा खांडू के साथ श्रद्धालुओं ने होमकुंड की यात्रा सफलता पूर्वक पूरी की। अब जबकि यात्रा बिना किसी बड़ी अप्रिय घटना के सकुशल संपन्न होने को है, देश-विदेश के सनातन धर्मी और नंदा भक्त यह सवाल पूछ रहे हैं—जब मौसम अनुकूल रहा और हजारों यात्रियों ने सुरक्षित यात्रा पूरी कर ली, तो आखिर किस मंशा से 2026 की यात्रा को 2027 के लिए टाला जा रहा था?

शौचालय का अभाव

बुग्यालों और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हजारों यात्रियों के रुकने के बावजूद एक भी अस्थाई शौचालय का प्रबंध नहीं किया गया। महिला व पुरुष श्रद्धालुओं को खुले में शौच के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान पहुंचा।पड़ावों पर पीने के पानी का कोई प्रबंध न होने के कारण यात्रियों को मीलों दूर प्राकृतिक स्रोतों और नालों से पानी ढोना पड़ा।


​पुलिस, प्रशासन और SDRF के व्यवहार ने जीता दिल

​यात्रा के अंतिम चरण में अचानक सक्रिय हुए पुलिस और प्रशासनिक अमले ने अपने आत्मीय और सहयोगी व्यवहार से यात्रियों का दिल जीत लिया। दुर्गम पड़ावों पर तैनात पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों और SDRF के जवानों द्वारा दिए गए सहयोग और आत्मीय व्यवहार की श्रद्धालुओं ने मुक्तकंठ से सराहना की।

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