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मशीन हो गया हूं, रोबोट सी हो चुकी जिंदगी,डॉ ललित चन्द्र जोशी की स्वरचित कविता

भागदौड़ भरी जिंदगी में आदमी एकदम रोबोट सा हो गया है कहीं न कहीं इससे आदमी तनावग्रस्त भी होता जा रहा है । व्यक्ति कम समय में ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश कर रहा है । वह कर्म तो कर रहा है लेकिन उसमें खुशी नहीं दिखाई देती । ऐसी भागदौड़ भरी जिंदगी को लेकर डॉ ललित चन्द्र जोशी ‘योगी’ पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग सोबन सिंह जीना परिसर,अल्मोड़ा द्वारा एक कविता लिखी गई है । जिसमें उन्होंने व्यक्ति की मशीन सी जिंदगी को सुंदर शब्दों में वर्णित किया गया है ।

डॉ ललित चन्द्र जोशी की स्वरचित कविता

मशीन हो गया हूँ

रोबोट सी हो चुकी जिंदगी,
और चलती मशीन हो गया हूँ।।
ज़रा भी फुर्सत मिलती नहीं,
जैसे भागती हुई ट्रेन हो गया हूँ।।

चेहरे में नहीं खिलते कमल
बुझे बुझे से रहते हैं अब।
मुद्दतों से, खुद को मिले नहीं,
खुद के लिए अनसीन हो गया हूँ।
रोबोट सी हो चुकी है जिंदगी,
चलती हुई मशीन हो गया हूँ।।

        @अनकही स्मृतियां

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