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सोमवार का दिन महादेव को समर्पित, जानें सोमवार को ही क्यों की जाती है शिवजी की अराधना

सोमवार का दिन भगवान शिवजी को समर्पित दिन है । देवों के देव महादेव की महिमा अपरंपार है।  मन में सच्ची श्रद्धा से भगवान की आराधना की जाए तो महादेव भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं । मान्यता है की सोमवार का व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है और मन की सारी मुरादें जरूर पूरी हो जाती हैं। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार को सुबह उठकर स्नान करके भगवान शिव की आराधना करें।लेकिन सोमवार को भगवान शिव की पूजा अर्चना क्यों की जाती है ?तो चलाई आइए जानते हैं इस दिन क्यों की जाती है शिवजी की आराधना।

जानें ये पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन को भगवान सोमनाथ ने शिव जी की पूजा अर्चना की थी ।  जिसके फल स्वरूप सोमनाथ निरोगी हो कर फिर से अपने सौंदर्य को पाया था ।  इसके बाद भगवान शिव ने दूज यानी द्वितीया तिथि को चंद्रमा को अपनी जटाओं में धारण किया । इसके बाद से पुरातन काल से सोमवार को भगवान शिव जी की पूजा  की जाती है ।  । मान्यता है कि इस दिन चंद्र देव की अराधना करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है । इसके साथ ही कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है ।  ज्योतिष विद्या में चंद्रमा को मन का स्वामी माना जाता है । भगवान शिव सोमवार दिन के अधिपत्य देवता कहलाते हैं । वहीं, एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में स्वीकार करने के लिए कठिन तप किया था। और उनके लिए सोलह  सोमवार के व्रत भी रखे थे।   इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने माता पार्वती को वरदान मांगने को कहा था, जिसमें उन्होंने शिव जी को पति के रूप में मांगा और भगवान शिव उन्हें मना नहीं कर पाए । तब से ही सोमवार के व्रत की मान्यता है ।

शिवजी का भक्तवत्सल रूप कभी परेशान नहीं होने की देता है सीख

भगवान शिव त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें नटराज, भक्तवत्सल, सदाशिव, और अर्धनारेश्वर आदि नामों से भी जाना जाता है। भगवान का नटराज जहां प्रलय का रूप है वहीं ये रूप जीवन में उल्लास, उमंग और कला प्रेम भी बताता है। शिवजी का भक्तवत्सल रूप कभी परेशान नहीं होने की सीख देता है। जिस रूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है उसी के अनुसार पूजा का फल मिलता है। इन रूपों में भगवान शिव की पूजा करने से शुभ फल मिलते हैं।शिव आदि शक्ति है जो शम्भू (स्वयंभू) है, अर्थात शिव जन्म मरण से परे हैं। शिव किसी काल के आधीन नहीं हैं और काल (समय) से भी ऊपर हैं। काल से उच्च होने के कारण शिव को महाकाल कहा जाता है। शिव शम्भू हैं क्यों की वे जनम मरण के चक्र में नहीं है। वे स्वंय पैदा हुए हैं और उनकी मृत्यु भी नहीं होती है। महाकाल का शाब्दिक अर्थ है काल से ऊपर या काल के प्रभाव की परिधि से मुक्त।शिव जहाँ सृजन के देव हैं वहीँ पर विनाश के भी देव हैं। शिव प्रलयकारी शक्ति भी हैं। त्रिदेवों में शिव ही काल से मुक्त हैं। 

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