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नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया एनआई एक्ट का नियम, चेक पर दस्तखत मान लिए तो नहीं चलेगा ‘खाली चेक’ का बहाना, खारिज की पुनर्विचार याचिका

नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले की सुनवाई की। जिसमें हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट का फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति चेक पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार कर लेता है, तो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट के तहत उस पर कानूनी देनदारी की धारणा लागू हो जाती है। साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि चेक पर बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने या फिर हस्ताक्षर और बाकी लिखावट में अंतर होने के आधार पर आरोपी अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

जानें क्या है पूरा मामला

​दरअसल यह मामला अल्मोड़ा जिले के रमेश सिंह नगरकोटी से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता ने दो लाख रुपये का एक बैंक चेक जारी किया था, जो खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण बैंक से बाउंस हो गया था। विधिक नोटिस (Legal Notice) भेजने के बावजूद जब राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो मामला अदालत पहुंचा। ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराते हुए एक साल के साधारण कारावास और 2.20 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सत्र न्यायालय में की गई अपील भी खारिज हो गई, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने केवल खाली चेक पर दस्तखत करके कुलदीप बिष्ट नामक व्यक्ति को दिए थे, जिसका बाद में दुरुपयोग किया गया। उसने तर्क दिया कि चेक पर बाकी लिखावट उसकी नहीं है।

याचिका खारिज

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि चेक पर याचिकाकर्ता के दस्तखत होना विवादित नहीं है। कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल यह तर्क देना कि चेक का विवरण किसी अन्य ने भरा है, आरोपी को कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं करता। जिस पर हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए रमेश सिंह नगरकोटी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।

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