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नंदा देवी बड़ी जात और लोकजात यात्रा: ​हिमालय की सबसे कठिन पदयात्रा, आस्था, भक्ति और सब्र का इम्तिहान, वांण से आगे बढ़ीं माँ नंदा की उत्सव डोलियां

रिपोर्ट – हरेंद्र बिष्ट
थराली (चमोली): श्री नंदा देवी बड़ी जात और लोकजात यात्रा अपने सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण चरण में पहुँच गई है। इसी क्रम में कल गुरुवार को यात्रा मार्ग के अंतिम आबादी वाले गांव ‘वांण’ से आगे बढ़ते ही हजारों श्रद्धालुओं का जत्था निर्जन पड़ाव ‘गैरोलीपातल’ और ‘वेदनी बुग्याल’ की ओर रुख करेगा।

इतिहास में पहली बार उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली लोकजात यात्रा और 12 वर्षों के अंतराल पर होने वाली बड़ी जात को लेकर इस बार श्रद्धालुओं में अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। थराली, देवाल, ग्वालदम और नंदकेशरी मार्ग से वांण गांव की ओर जाने वाले यात्रियों का तांता लगा हुआ है। इसके अलावा नंदानगर (घाट) से दशोली परगना, बण्ड परगना और ज्वालपा देवी की उत्सव डोलियों के साथ-साथ अनेक नंदा छतोलियों का कैलाश गमन हेतु प्रस्थान जारी है। अनुमान के मुताबिक, शुक्रवार (17 सितंबर) को वेदनी बुग्याल और गैरोलीपातल जैसे निर्जन क्षेत्रों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटेंगे।

निर्जन पड़ावों पर मूलभूत सुविधाओं का अकाल

यात्रा के अंतिम पड़ाव अत्यंत दुर्गम और पूरी तरह से निर्जन हैं, जिनमें गैरोलीपातल, वेदनी, पातरनचौनियां, बगवाबासा, शीलासमुद्र और तातणा शामिल हैं। बड़ी जात के यात्रियों को कम से कम 4 रातें इन्हीं निर्जन इलाकों में बितानी होंगी। इसके बावजूद, ग्राउंड जीरो पर स्थिति चिंताजनक है। जिसमें
• ​बिजली, पानी और शौचालय का अभाव: निर्जन पड़ावों में पेयजल, प्रकाश व्यवस्था और अस्थायी शौचालयों का कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया है।
• ​रास्तों की खस्ताहाली: पैदल मार्गों की मरम्मत न होने से यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
• ​अधिकारियों की मजबूरी: मोटर मार्गों तक पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती तो दिख रही है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में अधिकारी खुद भी असहाय नजर आ रहे हैं।

सरकार की अनदेखी पर उठ रहे सवाल

बताया कि गौरतलब है कि वर्ष 2025 में सरकार और नंदा देवी राजजात समिति (नौटी) द्वारा राजजात यात्रा को स्थगित कर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, सर्वसम्मत निर्णय न होने के कारण सिद्धपीठ कुरूड़ से 2026 में ही ‘बड़ी जात’ आयोजित करने का फैसला लिया गया। 5 सितंबर से शुरू हुई इस यात्रा में लगातार बढ़ रही भीड़ के बावजूद सरकार द्वारा समय रहते व्यवस्थाएं दुरुस्त न करने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दुर्गम राह व चढ़ाई

सरकारी व्यवस्थाओं की कमी के बावजूद श्रद्धालुओं और यात्रा कमेटियों (दशोली, बण्ड, ज्वालपा देवी) के हौसले बुलंद हैं। पूर्व में राजजात यात्रा (2000 और 2014) का अनुभव रखने वाले श्रद्धालु अपने स्तर पर गद्दे, स्लीपिंग बैग, गर्म कपड़े और सूखा राशन (ड्राई फ्रूट्स) साथ लेकर चल रहे हैं। श्रद्धालु अपनी अटूट लोक-आस्था के सहारे ही इन दुर्गम और कठिन पहाड़ियों की चढ़ाई पूरी कर रहे हैं।

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