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नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026: ज्यूरागली पार कर रूपकुंड पहुंचे शिव-नंदा के भक्त, सुहावने मौसम को माना मां नंदा का आशीर्वाद

थराली/देवाल
रिपोर्ट – (हरेंद्र बिष्ट):

श्री नंदादेवी बड़ी जात यात्रा 2026 के तहत उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहुंचे श्रद्धालु दुनिया के सबसे रहस्यमयी स्थानों में शामिल रूपकुंड की अनुपम सुंदरता और वहां बिखरे नरकंकालों को देखकर अचंभित रह गए।

श्रद्धालुओं में खासा उत्साह

यहां लगभग 16,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड के इस विहंगम दृश्य और दशकों बाद मिले बेहद साफ मौसम को यात्री मां नंदा का विशेष आशीर्वाद मान रहे हैं। सामान्यतः नंदा देवी राजजात या बड़ी जात यात्रा अगस्त के दूसरे पखवाड़े से शुरू होकर सितंबर के पहले-दूसरे सप्ताह तक समाप्त हो जाती है। इस दौरान लगातार बारिश और खराब मौसम के कारण श्रद्धालु अक्सर उच्च हिमालयी बुग्यालों और प्राकृतिक सौंदर्य का दीदार करने से वंचित रह जाते थे। हालांकि, इस बार दशकों बाद ऐसा संयोग बना कि 5 सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से शुरू हुई यह यात्रा सितंबर के दूसरे पखवाड़े तक साफ मौसम के बीच जारी है।

वेदनी बुग्याल में रहा अद्भुत नज़ारा

17 सितंबर को जब यात्रा समुद्र तल से लगभग 11,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित एशिया के सबसे बड़े बुग्यालों में शामिल वेदनी बुग्याल पहुंची, तो वहां का मौसम बिल्कुल साफ था। चारों ओर खिले भांति-भांति के फूल और रात में आसमान में चमकते चांद-तारे श्रद्धालुओं के लिए किसी स्वप्नलोक जैसे थे। यात्री भूपेंद्र बिष्ट ‘भुप्पी’ और डॉ. कृपाल भंडारी ने बताया कि इस प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर यात्रियों का उत्साह देखते ही बन रहा था और सभी इस पल को अपने कैमरों में कैद करने में जुटे रहे।

ब्रह्मकमल के दीदार

पातरनचौनिया (12,500 फीट) और केलवाविनायक (14,500 फीट) होते हुए जब यात्रा आगे बढ़ी, तो श्रद्धालुओं को बहुतायत में खिले ब्रह्मकमल देखने को मिले। शनिवार को यात्रा अपने 16वें पड़ाव के तहत जब 16,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित रहस्यमयी रूपकुंड पहुंची, तो चढ़ाई की सारी थकान गायब हो गई। बर्फ के बीच बिखरे प्राचीन नरकंकालों को देख श्रद्धालु दंग रह गए।

शीला समुद्र पहुंची यात्रा

रूपकुंड के दर्शन के बाद श्रद्धालुओं ने यात्रा के सबसे कठिन मार्ग ‘ज्यूरागली टॉप’ (17,500 फीट) को पार किया। वहां से त्रिशूली और नंदा घुंटी जैसी गगनचुंबी हिमशिखरों के दर्शन किए। इसके बाद ढलान उतरकर यात्रा तीसरे निर्जन पड़ाव ‘शीला समुद्र’ पहुंची।

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