October 26, 2021

सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को समाप्त करने वाले समाज सुधारक राजा राम मोहन राय की जयंती पर उन्हें कोटि- कोटि नमन

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आज भारतीय सामाजिक , ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राम मोहन की जयंती हैं राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल में 22 मई 1772 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे।

15 वर्ष की आयु में उन्होंने कई भाषा का ज्ञान हो गया था ।

इनके पिता का नाम रमाकांत तथा माता का नाम तारिणी देवी था। भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। 15 वर्ष की आयु मई में उन्होंने बंगाली, संस्कृत, अरबी तथा फ़ारसी का ज्ञान हो गया था। किशोरावस्था में उन्होने काफी भ्रमण किया। उन्होने 1809-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भी काम किया। उन्होने ब्रह्म समाज की स्थापना की तथा विदेश इंग्लैण्ड तथा फ़्रांस भ्रमण भी किया।

कुरीतियों को खत्म करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही ।

राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। हिन्दी के प्रति उनका अगाध स्नेह था। वे रू‍ढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे। वे स्वतंत्रता चाहते थे लेकिन चाहते थे कि इस देश के नागरिक उसकी कीमत पहचानें।

बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया।

राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। धर्म प्रचार के क्षेत्र में अलेक्जेंडर डफ्फ ने उनकी काफी सहायता की। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे।

राजा राम राय द्वारा रचित प्रसिद्द पत्र यह हैं

राजा राममोहन राय ने ‘ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन’, ‘संवाद कौमुदी’, मिरात-उल-अखबार ,एकेश्वरवाद का उपहार बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। बंगदूत एक अनोखा पत्र था। इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था।

1830 में हुई मृत्यु ।

1830 में राजा राममोहन राय अपनी पेंशन और भत्‍ते के लिए मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम गए। 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्‍टल के पास स्‍टाप्‍लेटोन में मेनिंजाइटिस के कारण उनकी मृत्‍यु हो गई। राजा राम मोहन राय को समाज से कुरीतियों, रू‍ढ़िवादी विचारधारा खत्म करने के लिये और समाज में नयी नवजागृति लाने के लिए सदैव स्मरण किया जाता रहेगा ।