पापी पेट ल्हि गयो परदेशा
लौट आयूँ पहाड़ों के देशा
किरिपा करिया हिमाला महादेवा
किरिपा करिया हो नरेंड़ देवा
माता भगवती पार्वती नंदा
गोलू गंगनाथ कलविष्ट देवा
आज पुर है गयो स्वेण मेरा
लौट आयूँ पहाड़ देशा।
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इस मनभावन गीत के बोल लिखे हैं कुमाउनी के वरिष्ठ साहित्यकार त्रिभुवन गिरी महाराज और अपनी सुरीली आवाज में इस रचना को गाया है कुमाउनी लोक गायक दीवान सिंह कनवाल ने । यदि इस गीत को आप सुनते हैं तो आप इन पहाड़ों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाएंगे। यह गीत आपको पहाड़ से जोड़ेगा और आप इन पहाड़ों को छोड़कर परदेश जाने के लिए क़भी मन नहीं बनाएंगे।
विगत कई सालों से मैं देख-सुन रहा हूँ कि लोक नृत्यों के नाम पर फूहड़ गीतमालाओं का चलन हो गया है। इस तरह के गाने बन रहे हैं जिनका अर्थ नहीं है। क्या झम्म लागी छै, आज कला का चेली ब्वारी में पलाजो की चौलि जैसे बेतुके गाने शादी और रिसेप्शन में बज रहे हैं और सबसे बड़ी बात है कि इन फूहड़ भरे गानों पर बहु-बेटियां थिरक भी रही हैं। ये हमारी भूमि के गीत नहीं हो सकते। हां यह व्यक्तिगत अनुभूति हो सकती है किंतु इन्हें कुमाउनी संस्कृति से जोड़ना घातक है। जिसके परिणाम बहुत भयानक होंगे।
आज जंगलों में नाचते हुए दृश्यांकन होता है
आधे अधूरे कुमाउनी वस्त्रों में और जीन्स टाई में कलाकर जंगलों, घर के आंगन में शूटिंग करते हुए अक्सर दिख जाते हैं। जबकि यह सही नहीं है। गांव में कोई जंगल जाती हुई महिला सिर पर छापरी रखे हुए या दातुली को कमर में खोसे हुए, झोड़े या जोड़ को गुनगुनाते हुए निकलती हैं, लेकिन क्या वह जंगल में दातुली और सिर पर डाले रखे हुए नाचती है क्या? मैंने आज तक ग्रामीण महिला को इस तरह क़भी नहीं देखा। किंतु आज जंगलों में नाचते हुए दृश्यांकन होता है। यह किस तरह के गीत,यह किस तरह का कोरियोग्राफ किया जा रहा है, मेरे समझ से परे है।
अब अधिकतर गाने सिर्फ हुड़दंग करने के लिए रचे जा रहे हैं
पूर्व में कुमाउनी गीत को सिद्धहस्त रचनाकार लिखा करते थे। उनके लिखे गए गीतों का गायन एवं दृश्यांकन/छायांकन होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब अधिकतर गाने सिर्फ हुड़दंग करने के लिए रचे जा रहे हैं। हर कोई लिखकर रातों रात स्टार बन रहा है।
हालिया वर्षों में पहाड़ में अश्लील गानों का चलन हुआ है।
इन सबके बीच साहित्यकार त्रिभुवन गिरी महाराज द्वारा लिखे गए लौटी आयूँ पहाड़ों के देशा…गीत और उस गीत को भावों में पिरोकर गाने वाले लोकगायक श्री दीवान कनवाल का यह गीत सुनकर आप पहाड़ों की तरफ जरूर मुड़ेंगे। अपनी माटी, अपनी पितृ एवं देव भूमि से जुड़कर इस गीत को सराहेंगे।
समीक्षक:
डॉ. ललित जोशी ‘योगी’
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
एस.एस. जीना परिसर,अल्मोड़ा
