उत्तराखंड: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को हाथीबड़कला स्थित सेंट्रियो मॉल के सिनेमा हॉल पहुंचकर बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन, भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ देखी।
कहीं यह बात
फिल्म देखने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि भारत की संत परंपरा सदैव समाज को सत्य, सेवा, करुणा और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाती रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड देवभूमि होने के साथ-साथ महान संतों की भूमि है। बाबा नीम करोली महाराज का कैंची धाम आज दुनियाभर में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है। मुख्यमंत्री ने फिल्म ‘हनुमान अंश’ के निर्माताओं और पूरी स्टारकास्ट के प्रयासों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत पर आधारित सकारात्मक फिल्में समाज में मानवीय मूल्यों और संस्कारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती हैं।
फिल्म हनुमान अंश
उत्तर भारत के थिएटर्स में फिल्म का प्रदर्शन काफी मजबूत देखा जा रहा है। हनुमान अंश 2026 में बनी एक हिंदी भाषा की भक्तिमय ड्रामा फिल्म है, जिसे विशाल चतुर्वेदी ने लिखा और निर्देशित किया है। यह फिल्म बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन पर आधारित है, जिन्हें महाराज-जी के नाम से जाना जाता है। फिल्म में शोभिनव सत्या लीड रोल में हैं। उनके अलावा चंदन आनंद, विहान शेडगे, पूर्णिमा तिवार, अनिल रस्तोगी, गुल्शन पांडे, मनीष चौधरी जैसे स्टार्स नजर आए हैं। फिल्म की कहानी नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित है। उनकी आध्यात्मिक यात्रा को दिखाया गया है। फिल्म ‘हनुमान अंश’ की कहानी महान संत नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित है। फिल्म में उनके बचपन से लेकर संत के रूप में उनकी पहचान बनने तक के सफर को दिखाया गया है। कहानी बच्चे लक्ष्मीनारायण से शुरू होती है, जिन्हें आगे चलकर भक्त नीम करोली बाबा या ‘महाराज जी’ के नाम से जानने लगते हैं। उनके मन में ईश्वर को खोजने की इच्छा पैदा होती है। इसी मासूम जिज्ञासा के चलते वो घर छोड़कर ईश्वर की तलाश में निकल पड़ते हैं। फिल्म में उनकी कठिन आध्यात्मिक यात्रा दिखाई गई है। वो जंगलों, नदियों, पहाड़ों और अलग-अलग मंदिरों में भटकते हैं। इस दौरान मौन, आत्म-अनुशासन और वैराग्य को अपनाते हुए वो प्रभु श्रीराम और हनुमान जी की भक्ति में लीन हो जाते हैं। सालों की साधना और आत्ममंथन के बाद उन्हें ये एहसास होता है कि ईश्वर को पाने का रास्ता सिर्फ एकांत या जंगलों से होकर नहीं गुजरता, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा में भी भगवान का वास है। इसके बाद वो अपना जीवन गरीबों, भूखों और दुखी लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं।