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उत्तराखंड: केदारनाथ मंदिर: तीर्थ पुरोहितों के अधिकार बरकरार, जिला अदालत ने बीकेटीसी की स्थगन याचिका की खारिज

उत्तराखंड: रूद्रप्रयाग: केदारनाथ मंदिर में तीर्थ पुरोहितों के अधिकारों से जुड़े मामले में जिला न्यायाधीश की अदालत ने बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) को बड़ा झटका दिया है।

अदालत का फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस पर अदालत ने मंदिर समिति की उस स्थगन याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सिविल जज के उस आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी, जो तीर्थ पुरोहितों को गर्भगृह में पूजा-अर्चना और दान ग्रहण करने का अधिकार देता है। सुनवाई के दौरान जिला न्यायाधीश नीना अग्रवाल ने कहा कि निचली अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय और उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व निर्णयों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ही अपना फैसला सुनाया है। अदालत ने बीकेटीसी के गवाह दीपक पंवार के बयानों का हवाला देते हुए माना कि यह स्पष्ट है कि तीर्थ पुरोहित अपने यजमानों के लिए रुद्रीपाठ कराते हैं और श्रद्धालु उन्हें अपनी इच्छा से दक्षिणा दे सकते हैं, जिसे लेने का उन्हें पूरा अधिकार है। फिलहाल सिविल जज का 25 मई का आदेश यथावत रहेगा। मामले की अगली सुनवाई अब 21 जुलाई को होगी।

जानें क्या था मामला

सिविल जज की अदालत ने 25 मई को एक आदेश पारित कर ‘पंच पंडा रुद्रपुर समिति’ के तीर्थ पुरोहितों को यह अधिकार दिया था कि वे अपने यजमानों के साथ गर्भगृह में प्रवेश कर अभिषेक, संकल्प, रुद्रीपाठ और परिक्रमा करा सकते हैं। साथ ही, उन्हें यजमानों से स्वेच्छा से दी जाने वाली दक्षिणा और उपहार ग्रहण करने की भी अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने मंदिर समिति को इस प्रथागत अधिकार में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया था। मंदिर समिति ने इस आदेश को जिला न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी थी। समिति के अधिवक्ता गजपाल सिंह रावत ने तर्क दिया कि ‘बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर अधिनियम, 1939’ के तहत गर्भगृह का चढ़ावा समिति की संपत्ति है और पूजा केवल अधिकृत पुजारियों द्वारा ही की जानी चाहिए। समिति ने आशंका जताई थी कि निचली अदालत का आदेश मंदिर की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

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