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उत्तराखंड: महर्षि सुश्रुत जयंती: ​प्लास्टिक सर्जरी से मोतियाबिंद तक, 2500 साल पहले ही महर्षि सुश्रुत ने लिख दी थी आधुनिक मेडिकल साइंस की पटकथा

उत्तराखंड: भारतीय चिकित्सा विज्ञान के स्वर्णिम इतिहास और शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के जनक महर्षि सुश्रुत की जयंती के अवसर पर हरिद्वार में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

2500 वर्ष पुरानी धरोहर

इस मौके पर चिकित्सा विशेषज्ञों ने महर्षि सुश्रुत के वैश्विक योगदान को रेखांकित किया और वर्तमान समय में आयुर्वेद की शल्य परंपरा को आधुनिक मानकों के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व शल्य चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार देने वाले महर्षि सुश्रुत को विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक माना जाता है। उनके द्वारा रचित महान ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ आज भी आधुनिक सर्जरी का आधारभूत स्तंभ है। इस ग्रंथ में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं का विस्तृत विवरण है। 120 से अधिक शल्य उपकरणों का उल्लेख है। अस्थिभंग, घाव, नेत्र, नाक, कान और मूत्ररोगों की वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ शामिल हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में जिसे आज नासा पुनर्निर्माण, मोतियाबिंद की सर्जरी और आघात चिकित्सा कहा जाता है, उसके मूल सिद्धांत महर्षि सुश्रुत ने सदियों पहले प्रतिपादित कर दिए थे।

आधुनिक ‘सर्जिकल स्किल ट्रेनिंग’ के भी अग्रदूत थे सुश्रुत

इस अवसर पर आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय ने कहा कि महर्षि सुश्रुत केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले ऋषि थे। उन्होंने कहा कि महर्षि सुश्रुत ने अपने विद्यार्थियों को वास्तविक शल्य चिकित्सा से पूर्व फल, सब्जियों, मोम और पशुओं के अंगों पर अभ्यास करने की शिक्षा दी थी। यह पद्धति आज की आधुनिक ‘सर्जिकल स्किल ट्रेनिंग’ की मूल अवधारणा से हूबहू मेल खाती है। डॉ. उपाध्याय ने युवाओं को इस अमूल्य विरासत से परिचित कराने और आयुर्वेद के प्रमाण-आधारित ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया।


हरिद्वार के ‘आयुर्वेद उत्कर्ष केंद्र’ में कम लागत पर सुरक्षित इलाज

जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, हरिद्वार डॉ. स्वास्तिक सुरेश ने इस मौके पर स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि हरिद्वार जनपद के बहादराबाद स्थित ‘आयुर्वेद उत्कर्ष केंद्र (शल्य चिकित्सा)’ में आयुर्वेदिक सिद्धांतों और आधुनिक मानकों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ दी जा रही हैं। यहाँ विशेष रूप से भगंदर (Fistula-in-Ano), अर्श (Piles), फिशर (Anal Fissure), पाइलोनाइडल साइनस और दीर्घकालिक घावों का इलाज किया जाता है। आयुर्वेद की इस विशिष्ट और बेहद प्रभावी तकनीक के माध्यम से अनेक रोगियों को सफल व सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। केंद्र में प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा परामर्श, ऑपरेशन और ऑपरेशन के बाद समुचित देखभाल की सुविधा उपलब्ध है। डॉ. स्वास्तिक सुरेश ने कहा कि यह केंद्र आम जनता को बहुत ही कम लागत में सुरक्षित और वैज्ञानिक आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा सेवाएँ प्रदान कर रहा है, जिससे राज्य में आयुर्वेदिक सर्जरी को एक नई पहचान मिल रही है।


वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में बढ़ती प्रासंगिकता

कार्यक्रम के समापन पर विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि आज जब पूरी दुनिया समग्र और समन्वित चिकित्सा पद्धतियों की ओर रुख कर रही है, तब महर्षि सुश्रुत के सिद्धांत और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। भारत की इस प्राचीन चिकित्सा परंपरा को वैज्ञानिक शोध के माध्यम से वैश्विक पटल पर और अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित करने की आवश्यकता है।

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