उत्तराखंड से जुड़ी खबर सामने आई है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में एक खास तरह की रामलीला चर्चा का विषय बनी हुई है।
इतने दिन तक चलता है रामलीला उत्सव
हम बात कर रहे हैं टिहरी रिसायत से शुरू हुई भटवाड़ी तहसील के गोरशाली गांव की रामलीला की। जिसने 122 वर्षों का स्वर्णिम सफर पूरा किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस रामलीला में राजा के प्रतिबंध के चलते यहां कई वर्षों तक भगवान राम के पात्र नहीं, बल्कि गांव के ईष्ट वासुकी नाग देवता का राजतिलक किया जाता रहा। लेकिन अब राजशाही खत्म होने के बाद से अब देवता की डोली के साथ राम के पात्र का ही राजतिलक किया जाता है। वही इस वर्ष रामलीला का मंचन 14 दिसंबर से चल रहा है, जो कि 21 दिनों तक पूरे उत्साह के साथ आयोजित होगा।
खास है मान्यता
रिपोर्ट्स के मुताबिक बताया गया है कि जनपद मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर गोरशाली गांव रामलीला की शुरूआत 1904 में हुई थी। तब तत्कालीन टिहरी रियासत के गुप्तचरों ने राजा तक इसकी सूचना दी। तब गुप्तचरों ने राजा को बताया कि गोरशाली गांव में रामलीला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें टिहरी रियासत के राजा के बजाय भगवान राम के पात्र का राजतिलक किया जाता है। राजा ने गांव की रामलीला पर प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी कर दिया। कुछ समय बाद गांव के दो बुजुर्गों अवि सिंह व मातबर सिंह चौहान ने कारोबारी राधा बल्लभ तथा घनानंद खंडूड़ी के माध्यम से टिहरी रियासत के राजा तक पैरवी की और क्षमा याचना के बाद रामलीला पर लगे प्रतिबंध को हटवाया। तब राजा ने ताम्र पत्र देकर रामलीला को मान्यता दी और ग्रामीणों को राजतिलक गांव के ईष्ट वासुकी नाग देवता का करने की बात कही। तब से यह परंपरा जीवित है।