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उत्तराखंड: ग्लेशियर झीलों के खतरे से निपटेगा उत्तराखंड: चमोली के वसुंधरा ताल में स्थापित होगा प्रदेश का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम

​उत्तराखंड: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से होने वाले ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) यानी झीलों के फटने के जोखिम को कम करने के लिए राज्य सरकार ने वैज्ञानिक निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक खास पहल शुरू की है।

खास पहल

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके तहत चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुंधरा ताल में प्रदेश का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। इससे समय रहते संभावित खतरों की पहचान कर निचले इलाकों को चेतावनी दी जा सकेगी। इस संबंध में बीते दिनों मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सुरक्षाकर्मियों के संयुक्त दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI) रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के विशेषज्ञों के नेतृत्व में यह अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलाया जाएगा।
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यह शामिल

इस अभियान में सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और फील्ड सपोर्ट के लिए राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के जवान भी शामिल हैं।

जोखिम श्रेणी
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​आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित हैं। इनमें से 13 झीलों को ‘संवेदनशील/उच्च जोखिम’ श्रेणी में रखा गया है:
• ​बागेश्वर: 1 झील
• ​चमोली: 4 झीलें
• ​पिथौरागढ़: 6 झीलें
• ​टिहरी गढ़वाल: 1 झील
• ​उत्तरकाशी: 1 झील
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