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उत्तराखंड: पौराणिक आस्था का केंद्र नीलकंठ महादेव मंदिर, जहाँ महादेव ने पिया था विष, जानें नीलकंठ महादेव मंदिर की महिमा और इसके पौराणिक महत्व की गाथा

उत्तराखंड: उत्तराखंड के प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो साझा की है।

साझा की वीडियो

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सीएम पुष्कर सिंह धामी ने वीडियो शेयर करते हुए देश-विदेश के शिवभक्तों से इस पावन तीर्थस्थल के दर्शन करने की अपील की है। उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि पौड़ी गढ़वाल जनपद आने वाले सभी श्रद्धालुओं को इस आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण पावन धाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए। श्रावण मास में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

मंदिर का अद्भुत महत्व

​पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित यह मंदिर सनातन आस्था और पौराणिक संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले ‘हलाहल’ विष को भगवान शिव ने यहीं अपने गले में रोका था, जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया था और उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ा। विषपान के बाद उसकी उष्णता को शांत करने के लिए भोलेनाथ ने यहां हजारों वर्षों तक वटवृक्ष के नीचे समाधि लगाकर तपस्या की थी। तपस्या पूर्ण होने पर उन्होंने यहीं अपने कंठ के प्रतीक रूप में स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना की थी। यह मंदिर ब्रह्म कूट, विष्णुकूट और मणिकूट—इन तीन पहाड़ियों के बीच मधुमती और पंकजा नदियों के संगम के पास स्थित है। मंदिर के शिखर पर समुद्र मंथन का अत्यंत सुंदर और सजीव दृश्य उकेरा गया है, जो इसकी वास्तुकला को विशिष्ट बनाता है।

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