उत्तरकाशी: जंगलों को वनाग्नि और अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों से बचाने के लिए वन विभाग ने अब स्थानीय समुदायों को जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
बैठक का आयोजन
मिली जानकारी के अनुसार जंगलों के संरक्षण की जिम्मेदारी को केवल सरकारी तंत्र तक सीमित न रखकर गांवों और वन पंचायतों की भागीदारी को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा। इसी उद्देश्य से आज मंगलवार को कोटबंगला स्थित वन चेतना केंद्र में वन पंचायत सरपंचों की एक महत्वपूर्ण गोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य वन संरक्षक (वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन) के निर्देशन में आयोजित इस बैठक में वन पंचायतों को वन संरक्षण व्यवस्था की मुख्य आधारशिला बताया गया। गोष्ठी के दौरान सरपंचों को उनके अधिकारों, दायित्वों और वन प्रबंधन की बारीकियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
गोष्ठी का आयोजन
बैठक का मुख्य फोकस जंगलों में लगने वाली आग (वनाग्नि) की रोकथाम, आग की सूचना पर तुरंत सामुदायिक प्रतिक्रिया, जंगलों का प्राकृतिक पुनर्जनन और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने पर रहा। गोष्ठी में पहुंचे सरपंचों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को साझा किया और वन प्रबंधन को और अधिक बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। मुख्य वन संरक्षक ने सरपंचों से अपील की कि वे ग्रामीणों को साथ लेकर जंगलों की सुरक्षा में आगे आएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सतर्कता, समय पर सूचना का आदान-प्रदान और सामूहिक प्रयास ही वनाग्नि जैसी गंभीर आपदा से जंगलों को बचा सकते हैं।
रहें मौजूद
इस गोष्ठी में प्रभागीय वनाधिकारी (उत्तरकाशी), उप निदेशक (गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान), प्रभागीय वनाधिकारी (भूमि संरक्षण), भटवाड़ी, धरासू व टिहरी डैम-2 के उप प्रभागीय वनाधिकारी, विभिन्न रेंज के क्षेत्राधिकारी, वन कर्मचारी और बड़ी संख्या में वन पंचायत सरपंच मौजूद रहे।