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है जुनून मर-मिटने का वतन के खातिर,डॉ.ललित योगी की स्वरचित पंक्तियां

साधु
न तो साधु ही किसी का हो सकता है!
और न ही नदी किसी के लिए थम सकती है।
अदब
अदब से! शीश झुकाकर चलना सीखो।
चेहरे पर अपने मुस्कान सजाना सीखो।।
हिय
हिय की बातों को हिय में दबाए रखता हूँ।
निःठुर हूँ,खुद को, खुद से छुपाए रखता हूँ।।
सीखो
संघर्षों को ढाल बनाकर,चलना सीखो।
खुद को मजबूत बनाकर,बढ़ना सीखो।
मैंने
मैंने अब चुप रहना सीख लिया
गम का घूंट पीना सीख लिया।
कभी-कभी
जिंदगी है-गमों की किताब
आंखों से सूखते हुए आँसू
होठों पर रूखापन
न स्वप्न,न कोई अरमान
न रिश्ते ही और न नाते
बड़ी बोझिल सी हो जाती है
जिंदगी क़भी-कभी!
वीर
है जुनून मर-मिटने का वतन के खातिर,
वीर खून से अपनी सींचते हैं यूं ही धरा।

     जान

जिंदगी उनके लिए जियो
जो जान देते हैं।
उनके लिए बिल्कुल भी नहीं!
जो जान लेते हैं।।
छाले
कभी देखा है तुमने?
गरीबों के पांव के छालों को?
रईस लोगों ने तो,
ऊंची अट्टालिकाएं देखी हैं।।
प्यार हो गया
लब हिले,धीरे से मेरे,
और इजहार हो गया।
दिल न खुद का ही रहा,
और प्यार हो गया।।
रिश्ते
बेशक!रुपयों से चलती है दुनिया,
पर दिल के रिश्ते बनते नहीं।
मिलते हैं पथ पर हजारों अपने
वो दिल का रिश्ता निभाते नहीं।।

✍️हँसते हुए चेहरे में छुपे हुए होते हैं गम।

       जाने से

जिंदगी हुई है परेशान,
किसी के चले जाने से।
हो गए मुफ्त के बदनाम।
किसी के चले जाने से।।

डॉ ललित योगी

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