देश दुनिया की खबरों से हम आपको रूबरू कराते रहते हैं। एक ऐसी खबर हम आपके सामने लाए हैं। 2,000 से अधिक के यूपीआई (UPI) ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और एनपीसीआई (NPCI) को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस व्यवस्था के लागू होने पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था को लाते समय आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अतिरिक्त शुल्क से छोटे व्यापारियों पर आर्थिक बोझ पड़ेगा। शुल्क से बचने के लिए लोग फिर से नकद लेनदेन की ओर लौट सकते हैं, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को झटका लगेगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि UPI के आने से काले धन के लेनदेन में बड़ी गिरावट आई है।
अधिसूचना के खिलाफ याचिका
बता दें कि 16 सितंबर को जारी की गई अधिसूचना के तहत 2 हजार रुपये से अधिक के UPI लेनदेन पर 0.4% MDR लगाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता अंजन दत्ता ने जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर इसे संविधान द्वारा दिए गए समानता और व्यापार करने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। जिस पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने शुल्क के स्वरूप पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इस तरह की वसूली करने का कार्यपालक दायरा क्या है? उन्होंने टिप्पणी की कि अगर यह एक सामान्य फीस होती तो समझ में आता, लेकिन अगर यह फीस नहीं है, तो फिर इसका वास्तविक स्वरूप क्या है? अदालत अब केंद्र, RBI और NPCI द्वारा 4 हफ्तों में दाखिल किए जाने वाले जवाब के बाद इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगी।
अदालत में सरकार का पक्ष
रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) वेंकटरमन ने अदालत को बताया कि यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होनी है और गेटवे का इस्तेमाल करने वाले 96 फीसदी उपयोगकर्ताओं (यूज़र्स) को इससे छूट दी गई है। ASG ने स्पष्ट किया कि डेबिट व क्रेडिट कार्ड लेनदेन की तरह UPI में भी परिचालन लागत आती है। उन्होंने कहा, “यह सरकार द्वारा ली जाने वाली कोई वैधानिक वसूली नहीं है और न ही सरकार इसमें से एक भी रुपया ले रही है। यह केवल सेवा देने वाले ऑपरेटरों और बैंकों के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI द्वारा सुगम बनाया जाता है।”