October 23, 2021

विश्व ऐस्टरॉइड डे : आइये जानें क्षुद्रग्रह से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

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सौर मंडल में बहुत सारे ऐस्टरॉइड या क्षुद्रग्रह यानी छोटे ग्रह हैं, जो निरंतर सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। ये वैसे ही सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जैसे बाकी के ग्रह। लेकिन ये क्षुद्रग्रह अन्य ग्रहों से बहुत छोटे होते हैं। क्षुद्रग्रह एक बेल्ट के रूप में होते हैं और इनमें से बड़ी संख्या में मंगल और ब्रहस्पति ग्रहों की कक्षाओं के बीच में पाए जाते हैं। हालांकि कुछ ऐस्टरॉइड ग्रहों के ऑरबिट यानी कक्षा में भी पाए जाए हैं। उनमें पृथ्वी के ऑरबिट के आस-पास भी कुछ क्षुद्रग्रह चक्कर लगाते हैं और कई बार पृथ्वी के करीब से गुजरते हैं या उल्का के रूप में वायुमंडल में प्रवेश कर जाते हैं। ये क्षुद्रग्रह जब पृथ्वी के पास गुजरते हैं या टकराते हैं तो कई बार भारी नुकसान भी पहुंचाते हैं।

30 जून 2017 से विश्व क्षुद्रग्रह दिवस मनाने की शुरुवात

क्षुद्रग्रह के खतरे को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए 30 जून को विश्व क्षुद्रग्रह दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का उद्देश्य क्षुद्रग्रह के प्रभाव और उससे खतरे के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना है। 30 जून 2017 से विश्व क्षुद्रग्रह दिवस मनाया जाता है। 30 जून को इस दिवस को मनाने के पीछे बड़ी वजह है। दरअसल इसी दिन 1908 को रूस की तुंगुस्का नदी के पास क्षुद्रग्रह की वजह से विस्फोट हुआ था। इसे क्षुद्रग्रह की वजह से धरती पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा नुकसान बताया जाता है। इसके बाद अंतरिक्ष में कई क्षुद्रग्रहों के बारे में पता किया गया।

क्षुद्रग्रहों को तीन वर्गों में बांटा गया है, कुछ का वर्गीकरण इनकी सौरमंडल में जगह के आधार पर भी किया गया है :

C वर्ग – इसमें 75% ज्ञात क्षुद्रग्रह आते हैं। ये काफ़ी धुंधले होते हैं। ये सूर्य के जैसी संरचना रखते हैं, लेकिन इन पर हाइड्रोजन और हीलियम नहीं होती।

* S वर्ग- 17% ज्ञात क्षुद्रग्रह इसी वर्ग में हैं। इनमें कई क्षुद्रग्रह चमकदार होते हैं और लोहा, निकेल तथा मैगनेशियम सीलीकेट, आदि से बने होते हैं।

* M वर्ग – बाकी के बचे हुए अधिकतर क्षुद्रग्रह इसी वर्ग में आते हैं, जो चमकदार निकेल और लोहे से बने होते हैं।

क्षुद्रग्रह के बारे में कुछ रोचक तथ्य

* पहला क्षुद्रग्रह सेरेस था, जिसे 1801 में ग्यूसेप पियाज़ी द्वारा खोजा गया था।

* खगोलविज्ञानी विलियम हर्शल ने 1802 में सबसे पहले Asteroid (क्षुद्रग्रह) शब्द नाम दिया, जिसका अर्थ है “तारा जैसा”।

*  वैज्ञानिकों के अनुसार, लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले एक क्षुद्रग्रह के प्रभाव से पृथ्‍वी पर चेन रिएक्शन हुई। यानी क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने के बाद कुछ ऐसे तत्व बने जो डायनासोरों के विलुप्त होने की वजह बने। इस उल्कापिंड से टकराने से वहां 100 किलोमीटर चौड़ा और 30 किलोमीटर गहरा गड्ढा बन गया था।

* वर्तमान में हमारे सौर मंडल में 600,000 से अधिक ज्ञात क्षुद्रग्रह हैं।

* अधिकांश क्षुद्रग्रह बेल्ट में परिक्रमा करते हुए पाए जाते हैं, जो मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच स्थित छल्ले की एक श्रृंखला हैं।

* हिडाल्गो’ नामक क्षुद्रग्रह की कक्षा मंगल तथा शनि ग्रहों के बीच पड़ती है।

* ‘हर्मेस’ और ‘ऐरोस’ नामक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की ही दूरी पर हैं।

* कुछ की ऑरबिट पृथ्वी की ऑबिट को काटती है और कुछ बहुत पहले पृथ्वी से टकराये थे। भारत में महाराष्ट्र में लोणार झील है। कहा जाता है कि यह झील क्षुद्रग्रह के गिरने के कारण ही बनी। 

नासा का यान लाएगा क्षुद्र ग्रह से नमूने

2016 में, नासा ने OSIRIS-REx अंतरिक्ष यान को Bennu नामक पृथ्वी के पास एक क्षुद्रग्रह का अध्ययन करने और क्षुद्रग्रह का एक नमूना वापस पृथ्वी पर लाने के लिए लॉन्च किया। 2018 में, OSIRIS-REx, बेन्नू के आसपास की कक्षा में चला गया। OSIRIS-REx, Bennu की सतह का अध्ययन करने में दो साल बिताएगा। 2023 तक यह पृथ्वी पर लौट आएगा। नासा ने  20 तक नमूनों के संग्रहण की शुरुआत करने का लक्ष्‍य रखा है। 
आपको बता दें कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी भी क्षुद्रग्रहों का अध्‍ययन करने के लिए जल्‍द ही अंतरिक्ष यान भेजेगी। इसके लिए ईएसए पहले ग्रह रक्षा सत्यापन मिशन पर विस्तृत डिजाइन कार्य आगे बढ़ रहा है। इसका नाम हेरा अंतरिक्ष यान है जो 2024 में डिडायम क्षुद्रग्रह जोड़ी के लिए उड़ान भरेगा। कोविड19 की वजह से इसके कार्यों में बाधा आई है। आने वाले समय में भारत भी नए क्षुद्रग्रहों और अन्य ग्रहों की खोज में उतरने की तैयारी कर रहा है।