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विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस: स्वलीनता वाले बच्चों को विभिन्न थेरीपियों द्वारा सामान्य विचारधारा से जोड़ा जा सकता है- भुवन चंद्र भट्ट

आज ‘विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस’ है। ऑटिज्म क्या अवस्था है व इसके लक्षण क्या होते हैं और इसकी जल्द पहचान क्यों जरूरी है यह जानना हमारे लिए बेहद जरूरी है।

आइए जानते हैं इसके बारे में…

दरअसल, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर मानसिक विकास से सम्बंधित समस्या है जो समझने और दूसरों के साथ बातचीत करने से संबंधित व्यवहार पर प्रभाव डालती है। ऑटिज्म के विषय में जागरूकता जरूरी है। हर वर्ष ‘2 अप्रैल’ को ‘विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस’ मनाया जाता है। इस बाबत अप्रैल के पूरे माह इससे से संबंधित कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक किया जाता है।

क्या कहते हैं डॉक्टर्स 

नगर के ऑक्युपेशनल थेरपिस्ट भुवन चंद्र भट्ट का कहना है कि स्वलीनता वाले बच्चों को विभिन्न थेरपीयो द्वारा सामान्य विचारधारा से जोड़ा जा सकता है । जिसमें ऑक्युपेशनल थेरपी, स्पीच थेरपी,
स्पेशल एजुकेशन, अप्लाइड बेहवियर एनालयसिस,
बिहेव्यर, मॉडिफ़िकेशन क्लिनिकल सायकॉलिजस्ट के द्वारा इन बच्चों  की बुद्धिमत्ता  का विश्लेषण किया जाता है । अगर सही समय पर २-३ साल में अगर इनके उपचार और थेरपी से कार्य किया जाए तो इन बच्चों को एक सामान्य जीवन शैली के अनुरूप ढाला जा सकता है ।

ऐसे पहचाने बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण

थेरपिस्ट भुवन चंद्र भट्ट बताते हैं कि स्वलीनता ( ऑटिज़म) एक ऐसे बच्चों का समूह है जिनकी अपनी अलग ही दुनिया होती हैं । जो आपने आप  में ही खोये रहते हैं। जिनको आपने आस पास होने वाले सामाजिक , व्यावहारिक परिवर्तनों से कोई सम्बंध नहीं होता ।  ब्लू रंग को ऑटिज़म का प्रतीक रंग माना गया है ।  जन्म के कुछ समय बाद बच्चों में होने वाले व्यावहारिक परिवर्तनों को अगर परिवार वाले समझ जाए तो इन बच्चों को हम एक सामान्य विचारधारा में ला सकते है । उनका कहना है कि
परिवार वाले अगर ये देखे कि उनका बच्चा एक बार में बुलाने पर नहीं आ रहा है या कोई उत्तर नहीं दे रहा है,उसका आइ कांटैक्ट कम है या नहीं है, वो ज़ायद समय अलग ही खेलना पसंद करता है, घर में होने वाले कार्यक्रम में उसको कोई रुचि नहीं है, शब्दों को बोलने में कोई रुचि नहीं लेता है, घर में भागता रहता है, तो ऐसे माता पिता को तुरंत ही पीडीऐट्रिक से मिल कर अपने बच्चे के बारे में विचार विमर्श करना चाहिए ।

ऑटिस्टिक बच्चे को उचित प्रशिक्षण मिलना जरूरी

ऐसे बच्चों को यदि समाज में अल्टिमेटली इन्कलुशन में लाना है तो पहले उन्हें स्कूल में भेजें जहां वे कुछ न कुछ सीखना शुरू करें, फिर जैसे ही वह बड़ा होगा और किशोर अवस्था में पहुंचेगा और फिर उसके आगे जाने पर उसके लिए नौकरी का सोचें। अगर ऐसा बच्चा कुछ पढ़ कर कर सकता है तो उसे वोकेशनल ट्रेनिंग दिलाई जा सकती है। ऐसे में हमें यह देखना है कि हर बच्चे की क्षमता के हिसाब से जितना उसकी अधिकतम उन्नति हो सकती है उसे उस स्तर तक ले जाएं। ऑटिज्म के लक्षणों की जल्द पहचान, सही देखभाल और उचित इलाज से ऑटिस्टिक बच्चे के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।   

ऑटिज्म के प्रारंभिक लक्षण

* बच्चे का 12 महीने का हो जाने तक कुछ इशारों का प्रयोग न सीखना

* 12 महीने तक की उम्र तक शिशु का बड़बड़ाना शुरू न करना

* 16 महीने के शिशु का एक भी शब्द न बोल पाना या न सीखना

* 24 महीनों से दो शब्द का सहज वाक्य न बोल पाना
* लोगों से घुलने-मिलने व सामाजिक संचार कौशल में असमर्थ

* इशारों से संयुक्त ध्यान न खींच पाना

*किसी भी उम्र में किसी भी भाषा या सामाजिक कौशल में असमर्थ

* काल्पनिक खेल न कर पाना

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