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विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा: हिमालयी महाकुंभ ‘मां नंदा बड़ी जात’ का आगाज: कुरुड़ सिद्धपीठ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली, गूंजे ​’जय मां नंदा’ के जयघोष

उत्तराखंड: उत्तराखंड में हिमालयी महाकुंभ के रूप में विख्यात मां नंदा की ‘बड़ी जात यात्रा’ बीते कल शनिवार, 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से विधि-विधान और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद कैलाश के लिए रवाना हो गई है।

नंदा राजजात यात्रा

सिद्धपीठ में पांच दिनों तक चले विशेष पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही मां नंदा देवी की डोली यात्रा के लिए निकली, पूरा क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के उद्घोष से गूंज उठा। जानकारी के अनुसार इस ऐतिहासिक विदाई के पल में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। इस धार्मिक यात्रा की अगुआई चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) कर रहा है। उसे 20 सितंबर को होमकुंड में देवी नंदा के साथ कैलास के लिए विदा किया जाएगा।

विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा

मां नंदा देवी की यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर की विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्राओं में से एक मानी जाती है। आम वर्षों में आयोजित होने वाली लोकजात यात्रा वेदनी कुंड तक ही जाती है, लेकिन इस बार ‘बड़ी जात’ के तहत डोली को सीधे होमकुंड तक ले जाया जाएगा, जहाँ अंतिम धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।

​यात्रा का मुख्य रूट और कार्यक्रम

• ​5 सितंबर: कुरुड़ सिद्धपीठ से तीनों डोलियों का कैलाश के लिए प्रस्थान।
• ​12 सितंबर: विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए रामणी आगमन, जहां विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का भव्य मिलन होगा।
• ​15 सितंबर: वाण स्थित लाटू देवता मंदिर में डोली का प्रवास।
• ​18 सितंबर: वेदनी बुग्याल में नंदा सप्तमी की विशेष पूजा-अर्चना।
• ​19 सितंबर: पातरनचौनियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेगी यात्रा।
• ​20 सितंबर: होमकुंड में मुख्य धार्मिक पूजा और चौसिंग्या खाडू की विदाई

यात्रा कहाँ से शुरू होगी


•  ​शुरुआती स्थल: माँ नंदादेवी सिद्धपीठ मंदिर कुरूड़, तहसील-नंदानगर, जनपद-चमोली (उत्तराखण्ड)।
•  ​प्रारंभ की तारीख: यात्रा का शुभारंभ 5 सितम्बर 2026 को सायं 4:00 बजे सिद्धपीठ कुरुड़ से डोलियों के प्रस्थान के साथ हो गया है।
​यात्रा का मुख्य पड़ाव और पूजा स्थल

•  ​यात्रा विभिन्न पड़ावों (जैसे मैठाणा, वांण, गैरोली पातल, बेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, शिला समुद्र आदि) से होते हुए 20 सितम्बर 2026 को होमकुण्ड पहुँचेगी।
• ​होमकुण्ड में बड़ी जात का विशेष पूजन, हवन, प्रसाद वितरण तथा चौसिंग्या खाडू की विदाई की जाती है।


​यात्रा कहाँ संपन्न होगी (समापन)

​यात्रा के समापन और माँ नंदादेवी के विराजमान होने के अलग-अलग पड़ाव/मार्गों के अनुसार
•  ​सिद्धपीठ देवराड़ा में स्थापना (मुख्य/बधाण यात्रा मार्ग के अनुसार)
◦  ​30 सितम्बर 2026 को यात्रा देवराड़ा पहुंचेगी।
◦ ​यहाँ सिद्धपीठ देवराड़ा में हवन के पश्चात् माँ नंदा राजराजेश्वरी 6 माह के लिए देवराड़ा मंदिर में स्थापित हो जाती हैं।
◦ ​इसके बाद मकर संक्रांति को पुनः माँ नंदादेवी सिद्धपीठ मंदिर कुरूड़ गर्भगृह में विराजमान होती हैं।
• सिद्धपीठ कुरूड़ वापसी मार्ग (दशोली एवं बण्ड क्षेत्र मार्गों के अनुसार):
▪  ​दशोली और बण्ड क्षेत्र के मुख्य यात्रा कार्यक्रमों के अनुसार, होमकुण्ड से वापसी के बाद 23 सितम्बर 2026 को यात्रा वापस सिद्धपीठ कुरूड़ पहुँचती है, जहाँ माँ नंदा देवी की मूर्ति थान में पुनर्स्थापना के साथ यात्रा संपन्न होती है।

मां के भाई लाटू देवता

पौराणिक मान्यताओं और लोक-संस्कृति के अनुसार, लाटू देवता को मां नंदा देवी (माता पार्वती) का धर्म भाई या चचेरा भाई माना जाता है। जब मां नंदा देवी (पार्वती जी) अपने मायके से विदा होकर ससुराल यानी कैलाश पर्वत की ओर जाती हैं, तो वांण गांव में उनका मिलन अपने धर्मभाई लाटू देवता से होता है। प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा (जो हर 12 वर्ष में आयोजित होती है) में वांण गांव को इस यात्रा का एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, जहाँ लाटू देवता माँ नंदा का स्वागत करते हैं और यात्रा के रक्षक बनते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब सभी भाई माता नंदा को विदा करने कैलाश की ओर चल रहे थे, तब रास्ते में प्यास लगने पर लाटू देवता ने गलती से पानी समझकर मदिरा पी ली थी। इससे वे अपना आपा खो बैठे और उपद्रव करने लगे, जिससे क्रोधित होकर मां नंदा ने उन्हें इसी स्थान पर कैद रहने का श्राप दिया और बाद में शांत होने पर वरदान दिया कि वे उनके रक्षक के रूप में यहाँ पूजे जाएंगे।

साल में सिर्फ एक बार खुलता है लाटू देवता का मंदिर

​उत्तराखंड के चमोली जिले के देवाल विकासखंड के वाण गांव में स्थित मंदिर लाटू देवता का मंदिर  कहलाता है। यह भारत के सबसे रहस्यमयी और अनोखे मंदिरों में से एक है। लाटू देवता मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक बार वैशाख पूर्णिमा (अप्रैल-मई के महीने) के दिन भक्तों के लिए खोले जाते हैं। इस दिन यहां बहुत बड़ा मेला लगता है, लेकिन श्रद्धालुओं को मुख्य मंदिर से लगभग 70 से 75 फीट की दूरी से ही दर्शन करने की अनुमति होती है। इसके बाद मार्गशीर्ष अमावस्या (नवंबर-दिसंबर) को कपाट वापस बंद कर दिए जाते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब इसके कपाट खुलते हैं, तो पुजारी अपनी आंख और मुंह पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में प्रवेश करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण माने जाते हैं।
• नागमणि का तेज- मान्यता है कि मंदिर के अंदर साक्षात नागराज अपनी अद्भुत नागमणि के साथ निवास करते हैं। उस मणि का प्रकाश इतना तीव्र होता है कि सामान्य आंखों से देखने पर व्यक्ति अंधा हो सकता है।
• विषैली गंध- मुंह पर पट्टी इसलिए बांधी जाती है ताकि पुजारी के मुंह की गंध से देवता रुष्ट न हों और नागराज की विषैली फुफकार या गंध पुजारी तक न पहुंचे।

​नौटी समिति की ‘नंदा देवी राजजात’ अब 2027 में

12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित होने वाली इस यात्रा को लेकर इस बार कुरुड़ मंदिर समिति और नौटी राजजात समिति के बीच तिथियों को लेकर भिन्न मत देखने को मिले। कुरुड़ समिति ने परंपरा के अनुसार 12 वर्ष पूरे होने पर इसी वर्ष (2026) 5 सितंबर से बड़ी जात यात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया। दूसरी ओर, नौटी नंदा देवी राजजात समिति और चमोली जिला प्रशासन ने पंचांगीय गणना के आधार पर यात्रा को 2027 तक स्थगित कर दिया है। इसके पीछे मुख्य कारण इस अवधि में पड़ने वाला ‘मलमास’ (शुभ कार्यों का वर्जित होना), सितंबर के अंत में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित बर्फबारी व बारिश, तथा संवेदनशील ट्रैक पर ढांचागत सुविधाओं का अधूरा होना है। प्रशासन की सहमति के बाद नौटी समिति अब नंदा देवी राजजात यात्रा का आयोजन 2027 में करेगी।

जानें पौराणिक मान्यता

हिमालय की आराध्य देवी मां नंदा (भगवती पार्वती) को उत्तराखंड में ध्याणी यानी ‘बेटी’ के रूप में पूजा जाता है। मां नंदा देवी की इस पावन जात (यात्रा) के पीछे एक अत्यंत भावुक और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा का विवाह कैलाशपति भगवान शिव के साथ हुआ था। पर्वतीय परंपरा में मां नंदा को ध्याणी (मायके की बेटी) माना जाता है। जब कोई बेटी विवाह के बाद पहली बार अपने मायके आती है, तो पूरा क्षेत्र खुशियों से झूम उठता है।
​मां नंदा भी जब कुरुड़ स्थित अपने मायके आती हैं, तो भक्त उनकी खूब सेवा-भगत करते हैं। लेकिन पौराणिक मान्यता है कि बेटी सदा के लिए मायके में नहीं रह सकती, उसे एक न एक दिन अपने पति के घर (ससुराल) लौटना होता है।

​कैलाश विदाई का होता है भावुक पल

जब मां नंदा के मायके का समय पूरा होता है और उनके ससुराल (कैलाश पर्वत) लौटने की घड़ी आती है, तो पूरे गांव और श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं। मायके वाले अपनी बेटी नंदा को सुहाग की सामग्री, अंगवस्त्र, नैवेद्य और स्नेह के साथ विदा करते हैं। कुरुड़ सिद्धपीठ से मां नंदा की डोली की विदाई इसी परंपरा का प्रतीक है। जब डोली विदा होती है, तो श्रद्धालु भारी मन से अपनी लाडली बेटी को कैलाशपति शिव के धाम (होमकुंड) के लिए विदा करते हैं।

​चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा) का रहस्य

मां नंदा की ‘बड़ी जात’ यात्रा में चार सींगों वाला मेढ़ा (चौसिंग्या खाडू) सबसे अद्भुत और रहस्यमयी अंग होता है। मान्यता है कि जब 12 वर्ष में यह बड़ी जात आयोजित होती है, तो किसी गांव में चमत्कारिक रूप से चार सींगों वाला खाडू (मेढ़ा) जन्म लेता है। यह खाडू पूरी यात्रा में मां नंदा की डोली के आगे-आगे मार्गदर्शक की तरह चलता है। यात्रा जब अपने अंतिम पड़ाव ‘होमकुंड’ (15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई) पहुंचती है, तो वहां मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद यह चौसिंग्या खाडू मायके वालों द्वारा भेजी गई भेंट और सुहाग सामग्री की गठरी को अपनी पीठ पर लादकर अकेले ही निर्जन कैलाश पर्वत की ओर बढ़ जाता है। इस तरह मां नंदा अपने ससुराल कैलाश धाम लौट जाती हैं। कथा के अनुसार, वाण गांव में स्थित लाटू देवता मां नंदा के धर्म भाई हैं। जब नंदा अपने ससुराल के लिए निकलती हैं, तो वाण गांव पहुंचने पर उनके भाई लाटू देवता उन्हें बहन के रूप में आगे की कठिन और दुर्गम हिमालयी यात्रा के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं और विदा करते हैं।

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