25 साल पहले, जब लोग सिर्फ़ एक राज्य नहीं, बल्कि एक पहचान की माँग कर रहे थे— देवभूमि उत्तराखंड। यह धरती सिर्फ़ पहाड़ों और नदियों का संगम नहीं है, यह वो धरती है जहाँ प्रकृति और भक्ति एक साथ साँस लेते हैं।
देश की धड़कन है यहां का पहाड़
हर बूँद, पानी की हर बूँद… एक कहानी कहती है। ये पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नहीं, देश की धड़कन हैं। इन्हीं चोटियों से पवित्र नदियाँ गंगा और यमुना निकलती हैं, जो पहाड़ों की पवित्रता को देश के कोने-कोने तक पहुँचाती हैं। लेकिन उत्तराखंड की खूबसूरती सिर्फ़ पहाड़ों और नदियों तक ही सीमित नहीं है; यह सिर्फ़ देवभूमि नहीं, वीरों की भी धरती है। यहाँ हर घर में एक सैनिक है, और हर माँ के दिल में ‘जय हिंद’ धड़कता है।
गौरा देवी ने पेड़ों को गले लगाकर दुनिया को बताया यह संदेश
यहीं रेनी गांव की गौरा देवी ने पेड़ों को गले लगाकर दुनिया को सिखाया था की यहां – ‘जंगल हमारे लिए माँ समान है।’ यहीं के लोगों ने दुनिया को बताया कि प्रकृति से जीना एक फ़र्ज़ है, ना की चॉइस। और यहीं के गीत, नाच, और परंपरा ने दिखाया कि संस्कृति सिर्फ त्यौहार नहीं – जीने का तरीका है। 25 साल उत्तराखंड के सिर्फ एक नंबर नहीं, ये सफर है हिम्मत, श्रद्धा और पराक्रम का। देवभूमि से लेकर सैनिक भूमि तक, गोलू देवता के न्याय से लेकर चिपको के सत्याग्रह तक, हर कहानी एक ही बात कहती है – उत्तराखंड सिर्फ एक राज्य नहीं, एक सोच है। एक सोच जो कहती है – ‘हम पहाड़ों के बीच पले हैं, पर हमारी सोच आसमान छूती है।’ 25 साल पूरे हुए… पर कहानी अभी लिखी जा रही है।
जय उत्तराखंड!