नैनीताल: उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (उपपा) के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को ट्रेन से हिरासत में लिए जाने के मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
कहीं यह बात
जिस पर हाईकोर्ट ने सरकार से सवाल किया है कि किस अपराध और नियम के तहत एक नागरिक को ट्रेन से उठा लिया गया, तथा क्या यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार से पूछा कि किस नियम के तहत प्रभात ध्यानी को ट्रेन से हिरासत में लिया गया? पुलिस को यह कैसे ज्ञात हुआ कि वे विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे? क्या नागरिकों को कहीं भी आने-जाने से रोकना उनकी स्वतंत्रता का हनन नहीं है? उपपा के केंद्रीय सचिव लालमणि द्वारा 20 जुलाई को दायर याचिका में कहा गया कि अध्यक्ष प्रभात ध्यानी शिक्षाविद सोनम वांगचुक के आह्वान पर दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे थे।19 जुलाई की शाम उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से हिरासत में लिया और उनका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया। बिना किसी अपराध के किसी वयस्क नागरिक को स्टेशन से उठाना सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का हनन है, जिसके लिए पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
राज्य सरकार और पुलिस का पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 (संज्ञेय अपराध रोकने के लिए एहतियातन हिरासत) के तहत की थी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि दिल्ली पुलिस ने सभी राज्यों को नोटिस जारी कर कहा था कि प्रदर्शन में भाग लेने आ रहे लोगों को उनके राज्य की सीमा पर ही रोक दिया जाए। इसी आधार पर उन्हें ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से रोका गया था।
सितंबर में होगी अगली सुनवाई
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान उत्तराखंड पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि प्रभात ध्यानी को रिहा कर दिया गया है।
हालांकि, मामले को गंभीरता से लेते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार सहित सभी संबंधित पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 16 सितंबर तय की है।