अल्मोड़ा: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले औषधीय पौधे किलमोड़ा (बरबेरिस एरिस्टाटा) ने ब्लड कैंसर (रक्त कैंसर) के इलाज में एक नई उम्मीद जगाई है।
जगी नई उम्मीद
जानकारी के अनुसार सोबन सिंह जीना (एसएसजे) विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त अध्ययन किया गया। जिसमें चूहों पर इसका परीक्षण पूरी तरह सफल रहा है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों से सामने आया है कि यदि किलमोड़ा की छाल का अर्क कीमोथेरेपी दवा डाक्सोरूबिसिन के साथ मिलाकर दिया जाए, तो उपचार अत्यधिक प्रभावी हो जाता है। दोनों के संयोजन से न केवल कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि पर नियंत्रण पाया गया, बल्कि कीमोथेरेपी से होने वाले दुष्प्रभावों में भी उल्लेखनीय कमी देखी गई।
किया परीक्षण
जिसमें अल्मोड़ा व रानीखेत से एकत्रित किलमोड़ा की छाल के अर्क का रासायनिक विश्लेषण करने के बाद एमटीटी असे, फ्लोरोसेंस माइक्रोस्कोपी, फ्लोसाइटोमेट्री और वेस्टर्न ब्लाटिंग जैसी तकनीकों से कैंसर कोशिकाओं पर इसका परीक्षण किया गया। ‘मुख्यमंत्री शोध प्रोत्साहन योजना’ के तहत वर्ष 2024 से जुलाई 2026 तक चले इस दो वर्षीय शोध में विज्ञानियों ने सफलता हासिल की। रैट मॉडल (चूहों) पर सफल परिणाम मिलने के बाद अब विज्ञानी इस संयोजन चिकित्सा को इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) को भेजने की तैयारी कर रहे हैं।