अल्मोड़ा दुखद: अलविदा जुगल किशोर पेटशाली, साहित्यकार व रंगकर्मी जुगल किशोर का निधन, शोक की लहर, पहली किताब राजुला मालूशाही से मिली थी पहचान

अल्मोड़ा से जुड़ी दुखद खबर सामने आई है। कत्यूर वंश के राजकुमार मालूशाही व शौका वंश की कन्या राजुला की अमर प्रेमगाथा राजुला-मालूशाही को दूरदर्शन के जरिये दुनिया तक पहुंचाने वाले लेखक, साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली का निधन हो गया है।

लंबे समय से चल रहे थे अस्वस्थ

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अल्मोड़ा जिले के चितई के निवासी 79 वर्षीय जुगल किशोर पेटशाली लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्होंने अपने पैतृक आवास में अंतिम सांस ली है। परिजनों ने बताया कि किशोर लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे जिसके कारण बीते गुरुवार को उनका निधन हो गया। आज शुक्रवार को करीब 10:30 बजे किशोर की अंतिम संस्कार की यात्रा उनके पैतृक आवास से दलबैंड तक निकाली गई। उनके निधन से परिवार व क्षेत्र में शोक की लहर है।

किया गया सम्मानित

अल्मोड़ा के चितई के पास पेटशाल गांव में सात सितंबर 1946 को स्व. हरिदत्त व लक्ष्मी पेटशाली के घर जन्मे जुगल किशोर ने लोक साहित्य, लोक संगीत व लोक नृत्य पर उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्होंने 1990 में पहली किताब राजुला मालूशाही लिखी। तीन साल बाद इसे संगीत नाटिका के रूप में फिल्मांकित किया, जिसे बाद में दूरदर्शन के माध्यम दुनिया तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें जयशंकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपनी पूरी जिंदगी लोक साहित्य, लोकगाथाओं और संस्कृति के संरक्षण को समर्पित कर दी। उनकी कृतियों में राजुला मालूशाही और पिंगला भृतहरि जैसे महाकाव्य, जय बाला गोरिया, कुमाऊं के संस्कार गीत, उत्तरांचल के लोक वाद्य, कुमाउनी लोकगीत, गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो (होली गीत संग्रह), बखत, जी रया जागि रया जैसे कविता संग्रह, गंगनाथ-गीतावली और भ्रमर गीत जैसी संपादित पुस्तकें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अपने योगदान के लिए उन्हें जय शंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार, कुमाऊं गौरव सम्मान और उत्तराखंड सरकार का वरिष्ठ संस्कृति कर्मी पुरस्कार प्राप्त हुआ।