20 अगस्त: कुमाऊं का लोकपर्व सातू-आठू आज, जानें बिरूड़ा पंचमी का महत्व, पूजन विधि, सात अनाजों में छुपा लोक-संस्कृति का खास महत्व

आज 20 अगस्त 2026 है। आज बिरूड़ा पंचमी है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में मनाए जाने वाले प्रसिद्ध लोक पर्व ‘सातू-आठू’ (गौरा-महेश्वर उत्सव) की शुरुआत का दिन है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को महिलाएं तांबे या पीतल के बर्तन में पांच या सात प्रकार के अनाज (जैसे गेहूं, चना, मटर, गहत आदि) भिगोती हैं, जिन्हें ‘बिरूड़े’ कहा जाता है। पंचमी के दिन महिलाएं तांबे या पीतल के बर्तन में गेंहू, चना, मटर, गहत, मक्का आदि पांच-सात प्रकार के अनाज भिगोती हैं, जिन्हें ‘बिरूड़ा’ कहा जाता है। पंचमी से शुरू यह उत्सव सप्तमी (सांतू) और अष्टमी (आठूं) तक चलता है, जिसमें पारंपरिक लोकनृत्य, गीत और गौरा-महेश्वर की मूर्तियों के विसर्जन के साथ समापन होता है।

बिरुड़ पंचमी आज

आज बिरुड़ पंचमी है। कुछ दिन पहले तांबे की छोटी पतीली में पांच या सात अनाज शुद्ध (साफ) पानी में भिगाने के लिए रख दिए जायेंगे। उसके लिए पहले तांबे की पतीली को अच्छी तरह से धोने के बाद उसके चारों और पांच-सात या नौ जगहों पर गाय के गोबर के साथ हरे दूब की स्थापना की जाती है और उसे पिठयां-अक्षत भी लगाया जाता है। पतीली के चारों ओर कलावा भी तीन या पांच बार घुमाकर बांधा जाता है। जो पांच या सात अन्न बिरुड़ के लिए भिगाए जाते हैं, उनमें चना, गेहूँ, जौ, मटर, सफेद तिल, मॉस (उड़द), पीली सरसों आदि शामिल किए जाते हैं। इसके अलावा एक छोटे से सूती कपड़े में फल, बिरुड़ के लिए भिगाए गए अन्न, एक सिक्का और दूब का एक गुच्छा बांध लिया जाता है। इसे भी बिरुड़ वाले बर्तन में ही रख दिया जाता है। उसके बाद इसे घर के अन्दर स्थापित द्याप्तों (मन्दिर) की जगह पर रख दिया जाता है। सप्तमी (सातूँ) के दिन भिगाए बिरुड़ों को धारे, नौले में सामुहिक तौर पर शुद्ध जल से धोया जाता है। सूती कपड़े में अलग से पोटली में बांधकर भिगाए बिरुड़ ऑठों के दिन गौरा- महेश को चढ़ाए जाते हैं। पतीली में भिगाए गए बिरूड़ों को आठूँ की शाम को या फिर नौवें दिन सवेरे भूनकर प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया जाता है।‌ बिरूड़ों का प्रसाद आस-पड़ोस व नाते-रिश्तेदारों में भी बांटा जाता है।

जानें पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सातूँ-आठूँ का पर्व कैलाश से नाराज होकर अपने मायके आई गौरा (पार्वती) को वापस ससुराल ले जाने के लिए आए महेश (शिव) की आवभगत का पर्व है। जिसमें धान, मक्का और दूसरी हरी घास से गौरा-महेश की मूर्तियों (पुतलों) का निर्माण किया जाता है। दोनों की मूर्तियों को दूल्हन व दूल्हे की तरह की सजाया जाता है। आठूँ के दिन गौरा की महेश के साथ विदाई की जाती है। यह बिल्कुल उसी तरह होती है जैसे शादी के दिन बेटी की विदाई की जाती है। गौरा की महेश के साथ विदाई के पल बहुत ही भावुक कर देने वाले होते हैं। विदाई के साथ ही महेश से गौरा की अच्छी तरह से देखभाल करने और उसे किसी तरह का कष्ट न देने के गीत भी गाए जाते हैं। साथ ही गौरा को मायके की ओर से यह विश्वास भी दिलाया जाता है कि ससुराल (कैलाश) में किसी भी तरह की परेशानी होने पर वह बिना झिझके अपने मायके आ सकती हैं। विवाह हो जाने से उसका मायके से नाता नहीं टूटा है बल्कि और मजबूत हो गया है। जहां-जहां सातूँ-आठूँ का पर्व मनाया जाता है वहां के लिए महेश (शिव) अराध्य नहीं बल्कि जवाईं हैं और गौरा (पार्वती) एक बेटी होती है।