देवभूमि उत्तराखंड में देवी देवताओं से जुड़ी काफी कथाएं प्रचलित है। चार धाम के अलावा यहां कई देवी देवताओं के प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनकी अपनी अलग -अलग मान्यता है। आज हम चर्चा करेंगे जोशीमठ के नृसिंह देवता के मंदिर के विषय में ।आजकल ये मंदिर काफी चर्चाओं में है । जोशीमठ के नृसिंह देवता मंदिर के निर्माता आदि शंकराचार्य को माना जाता हैं । क्योंकि भगवान नृसिंह को वह अपना इष्टदेव मानते थे। मान्यता है कि जोशीमठ के नृसिंह भगवान के दर्शन किए बिना भगवान बदरीनाथ की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। इसलिए इस मंदिर को नृसिंह बदरी भी कहा जाता है।नृसिंह देवता की मूर्ति की बाजू लगातार पतली होते जा रही है। जिसको लेकर कई मान्यताएं हैं ।तो आइए जानते हैं इसके पीछे का रहस्य और मान्यता।
जय व विजय नाम के पहाड़ आपस में मिलने से नहीं हो सकेंगे बदरीनाथ के दर्शन
केदारखंड के सनत कुमार संहिता में कहा गया है कि जब भगवान नृसिंह की मूर्ति से उनका हाथ टूट कर अलग हो जाएगा तो विष्णुप्रयाग के समीप पटमिला नामक स्थान पर स्थित जय व विजय नाम के पहाड़ आपस में मिल जाएंगे और बदरीनाथ के दर्शन नहीं हो पाएंगे। तब जोशीमठ के तपोवन क्षेत्र में स्थित भविष्य बदरी मंदिर में भगवान बदरीनाथ के दर्शन होंगे। केदारखंड के सनतकुमार संहिता में भी इसका उल्लेख मिलता है। बताते हैं कि आठवीं सदी में आदि गुरू शंकराचार्य ने ही भविष्य बदरी मंदिर की स्थापना की थी। इस मंदिर में आदिगुरु शंकराचार्य की गद्दी भी है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी।इस बात को जोशीमठ घटना से सबसे ज्यादा जोड़ा जा रहा है।
कार्तिकेयपुर नाम से प्रसिद्ध थी जगह
हिंदू ग्रंथों के अनुसार नरसिंह देवता भगवान विष्णु जी के चौथे अवतार थे। पौराणिक काल में इस जगह को कार्तिकेयपुर नाम से जाना जाता था। नृसिंह बदरी मंदिर में भगवान की मूर्ति करीब 10 इंच की है यह शालिग्राम पत्थर से बनी हुई है। मंदिर में भगवान नृसिंह की मूर्ति एक कमल पर विराजमान है। भगवान नृसिंह के अलावा मंदिर में बद्रीनारायण, कुबेर, उद्धव की मूर्तियां भी विराजमान हैं। वहीं भगवान नृसिंह के दाईं तरफ राम, सीता, हनुमानजी और गरुड़ की मूर्तियां भी स्थापित है और बाईं तरफ में कालिका माता की प्रतिमा स्थापित है।मंदिर में स्थित भगवान नृसिंह की प्रतिमा की दाहिनी दिशा में हाथ की भुजा पतली है और यह हर साल धीरे-धीरे पतली होती जा रही है।
जानें ये प्रचलित कथा
एक प्रचलित कथा के अनुसार , एक समय में जोशीमठ में एक वासुदेव नाम के एक राजा का शासन था। एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए वन में गए हुए थे। इसी समय भगवान नृसिंह राजा के महल में आए औऱ महारानी से भगवान नृसिंह ने भोजन के लिए कहा। महारानी ने आदर पूर्वक भगवान को भोजन करवाया। भोजन के पश्चात भगवान के राजा के बिस्तर पर आराम करने के लिए कहा। इस बीच राजा शिकार से लौट आए और अपने कक्ष में पहुंचे। राजा ने देखा की एक पुरुष उनके बिस्तर पर लेटा हुआ है। राजा क्रोधित हो उठे और तलवार से उन पर वार कर दिया। तलवार लगते ही व्यक्ति के बाजू से खून की बजाय दूध बहने लगा। और पुरुष भगवान नृसिंह के रूप में बदल गया। राजा को अपनी भूल का जब पता चला तो वह क्षमा मांगने लगे । भगवान नृसिंह ने कहा कि तुमने जो अपराध किया है उसका दंड यह है कि तुम अपने परिवार के साथ जोशीमठ छोड़ दो और कत्यूर में जाकर बस जाओ। इसके साथ ही भगवान ने कहा कि तुम्हारे प्रहार के प्रभाव से मंदिर में जो मेरी मूर्ति विराजमान है उसकी एक बाजू पतली होती जाएगी और एक दिन ऐसा आएगा जब वह पतली होकर गिर जाएगी और उस दिन राजवंश का अंत हो जाएगा।