आज बसंत पंचमी का त्यौहार है । प्रत्येक वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष के पांचवे दिन यानि पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का महापर्व मनाया जाता है। इस दिन विद्या की देवी और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है । बसंत पंचमी के दिन को देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं ।सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है । आज यानि बसंत पंचमी से बसंतोत्सव की शुरुआत होती है, जो होली तक चलता है । बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है । बसंत पंचमी को श्रीपंचमी और सरस्वती पंचमी के नाम से भी जाना जाता है । सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है ।
जानें कथा
कथानुसार सृष्टि रचना के दौरान भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की । ब्रह्माजी अपने सृजन से असंतुष्ट थे । उन्हें लगा कि कुछ कमी है । विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल का छिड़काव किया । पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही कंपन होने लगा । और इसके बाद अद्भुत शक्ति प्रकट हुई । यह शक्ति चतुर्भुजी सुंदर स्त्री थी । जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरे हाथ में वर मुद्रा थी । अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी । ब्रह्माजी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया । तो देवी ने जैसे ही वीणा बजाई । संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हुई । जलधारा में कोलाहल व्याप्त हुआ । पवन चलने से सरसराहट होने लगी । तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा ।
शिक्षाविद, विद्यार्थी ज्ञानवान होने की प्रार्थना इसी दिन करते हैं
मान्यता है कि इस दिन सबसे पहले पीतांबर धारण करके भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन माघ शुक्ल पंचमी को किया था । तब से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का प्रचलन है ।
आज के दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है । आज इस दिन मां सरस्वती की पूजा विधि-विधान से किये जाने से विद्या और ज्ञान का आर्शीवाद मिलता है । सरस्वती पूजा के दिन सरस्वती स्त्रोत का जाप भी जरूर करना चाहिए । साथ ही पूजा वाली जगह पर कोई पुस्तक, वाद्य यंत्र या कोई भी कलात्मक चीज आवश्यक रखें । शिक्षाविद, विद्यार्थी ज्ञानवान होने की प्रार्थना इसी दिन करते हैं। इस विशेष दिन अबूझ मुहूर्त मानकर विद्यारंभ, अन्नप्राशन, विवाह, मुंडन गृह प्रवेश के शुभ कार्य भी किए जाते हैं।
माँ की वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥