शिशुओं की मुँह दिखाई
डॉ. ललित योगी
पहले जब शिशु जन्मते थे,
तो तब फटाफट नहीं होती थी मुँह दिखाई
अंधेरे कोने में पैदा हुए शिशु,
निंगाल के बड़े डालों में सुलाये जाते थे..
कई माह तक नहीं होते थे
आंगन के दर्शन।
बूढ़ी दादियां क़रतीं थीं परहेज
शिशु को सभी को छूने और दिखाने से।
दादियां लगाती थीं कजरी
नवजात और प्रसूता को।
यह काला टिका होता था,
कुदृष्टि/नजर से बचाने के लिए….
जन्म के बाद ही होता था,
शिशुओं का बाहरी दुनिया से विच्छेद।
नन्हे शिशु भी बचे रहते थे,
जर्जर हाथ की रगड़ और अनवांटेड इन्फेक्शन से।
जब नवजात जाते थे पहली बार ननिहाल
तब जच्चा कंडाली पकड़ कर
गधेरे पार कराती थी!
घर की बूढ़ी स्त्रियां कहती हैं
कि ऐसे नहीं ले जाये जाते थे नवजात!
उन्हें छल-छितर लग जाता है।
कुदृष्टि से उन नवजातों को यूं ही
छुपाया जाता था।
तब यूं ही बचाये जाते थे तब शिशु।
अब शिशु होते हैं- पैदा, तो
वह इस सतरंगी दुनिया के साथ
सोशल मीडिया की दुनिया में करते हैं-प्रवेश
माँ-बाप भी जन के बाद ही शिशु को,
FB, इंस्टा, व्हाट्स ऐप स्टेटस में करते हैं-पोस्ट
मां बनने की खुशी भी,
सोशल पर ज़ाहिर होने लगती है।
अनगिनत शिशु पैदा होते ही
क्षणभर में ही
वर्चुअल दुनिया की अनवांटेड खबरों की तरह
तैरने लगते हैं।
शिशु इस तरह आम से खास हो जाते हैं-
पर शिशु इन सब से अनजान रहते हैं।
क्योंकि उनकी आंखें भी सही से
खुली नहीं रहती।
वर्चुअल दुनिया में स्माइली, संदेश भेजकर
दुनिया वाले एक परंपरा निभा देते हैं।
धकाधक मैसेज उमड़ने लगते हैं –
बादलों की तरह।
फोन की घण्टियाँ बजने लगती है-
धड़ाधड़।
बहुत शोरगुल, रेडियो एक्टिव रेज़,
जच्चा-बच्चा के आस-पास।
शिशु चाहते हैं अकेलापन
उन्हें आराम चाहिए….
वर्चुअल दुनिया के दौर में,
न दादियां दिखती हैं
न अंधेरे कोने….
और न ही उनको नजर लगती है..।