आज एतिहासिक दशहरा महोत्सव है। हर साल मनाया जाने वाला दशहरा महोत्सव में सभी उम्र के लोग शामिल होते हैं और इस महोत्सव का आनंद उठाते हैं। हर साल अल्मोड़ा में दशहरा महोत्सव पर अलग अलग पुतले खासकर रावण का पुतला आकर्षण का केंद्र होते है।
अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव-
अल्मोड़ा के दशहरा महोत्सव ने पूरे भारत में ही नहीं वरना पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। यह उत्तर भारत का प्रमुख दशहरा मेला बन चुका है। देशी-विदेशी पर्यटक इसका आनन्द लेने अल्मोड़ा पहुंचते हैं। दशहरा महोत्सव की अपूर्व ख्याति से प्रभावित होकर लगभग दो दशक पूर्व ‘भारत महोत्सव’ में अल्मोड़ा के कलाकारों को रावण के पुतला निर्माण के लिये राजधानी दिल्ली विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। इस महोत्सव में देश के विभिन्न प्रान्तों के कलाकारों को लोककला/लोक संस्कृति के प्रदर्शन हेतु बुलाया गया था। जाहिर है संस्कृति के प्रदर्शन हेतु बुलाया गया था। आज भी सांस्कृतिक नगर अल्मोड़ा को पर्यटन मानचित्र में शामिल करने के लिए अल्मोड़ा दशहरा महोत्सव महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
अल्मोड़ा नगर बौद्धिक क्रियाकलाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं के लिए है प्रसिद्ध-
अल्मोड़ा दशहरा महोत्सव की चर्चा करने से पूर्व यहां मंचित होने वाली रामलीला पर संक्षेप में प्रकाश डालना इसलिये जरूरी है चूंकि ये दोनों आयोजन एक दूसरे के पूरक हैं। अल्मोड़ा नगर बौद्धिक क्रियाकलाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं के लिये चन्द शासकों के शासन काल से ही प्रसिद्ध था। ब्रिटिश शासन काल में इस सांस्कृतिक परम्परा में एक नया अध्याय अल्मोड़ा नगर के मकीरी मोहल्ले के प्रखर विद्वान, कुमाऊँ के प्रथम डिप्टी कलेक्टर देवी दत्त जोशी ने जोड़ दिया। देवी दत्त जोशी प्रख्यात वैज्ञानिक सूर्य ऊर्जा से भनुताप यंत्र बनाने वाले श्रीकृष्ण जोशी के भ्राता थे। जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा पाई थी। देवीदत्त जोशी भारत के विभिन्न भागों में मंचित होने वाली रामलीला के प्रस्तुतीकरण में पर्याप्त बदलाव करना चाहते थे। मैदानी क्षेत्रों की रामलीला में पात्र, डायलाक बोलते और पर्दे के पीछे से यदा-कदा कोई गीत गाया जाता तो पात्र होंठ हिलाकर अभिनय करते। मैदानी क्षेत्रों की रामलीला में पर्याप्त परिवर्तन करके देवीदत्त जोशी ने गेय पद्धति पर आधारित श्री रामलीला का शुभारम्भ सन् 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर में किया। देवीदत्त जोशी के पारिवारिकजनों के अनुसार प्रथम वर्ष लीला छिलकों (चीड़ के पेड़ के लीसा युक्त छोटी-छोटी लकड़ियों) और मिट्टी तेल के दियों के सहारे संक्षेप में की गई लेकिन अगले वर्ष 1861 में सम्पूर्ण रामलीला ग्यारह दिनों तक मंचित हुई। देवीदत्त जोशी ने रामलीला के अलग-अलग प्रसंगों श्रृंगार, वियोग, युद्ध, आसुरी प्रवृत्ति को लेकर शास्त्रीय संगीत की राग-रागनियों का स्थानीयकरण (ताल पक्ष सहित) किया और उर्दू के शब्दों को भी अंगीकार किया। इस रामलीला में पात्र स्वयं गाकर अभिनय करते जिससे दर्शक ठगे रह जाते। कालान्तर में बद्रेश्वर की यह रामलीला ख्याति प्राप्त कर गई। अल्मोड़ा नगर के कुछ मोहल्लों में उन्नीसवी शताब्दी के अन्तिम दशक में और कुछ स्थानों में बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में रामलीला मंचित होने के साक्ष्य मिलते हैं। उन्नसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षो तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में कुछ रामलीला नाटक अलग-अलग लेखों/संगीतज्ञों ने लिखे, जिससे अल्मोड़ा से प्रारम्भ हुई रामलीला को व्यापकता मिल गई।
हर साल चैत्र के नवरात्र में होता है रामलीला का मंचन-
यह रामलीला कुमाऊँ के विभिन्न नगरों, कस्बों और गांवों में मंचित होने लगी। ज्यादातर स्थानों में शरदीय नवरात्रों में इसका मंचन होता है लेकिन कहीं-कहीं दीपावली के बाद, कहीं चैत्र के नवरात्र में रामलीला का मंचन किया जाता है। समय-समय पर संगीतज्ञों और विद्वानों ने प्रचलित धुनों में परिवर्तन किया। नए-नए प्रसंग जोड़े गए जिससे रामलीला में और अधिक निखार आ गया कुमाऊँ की यह रामलीला लोक जीवन में रस-बस गई। कहा जा सकता है कि रामलीला कुमाऊँ की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा का हिस्सा बन गई। प्रख्यात नृत्य सम्राट उदयशंकर द्वारा अल्मोड़ा नगर में मंचित रामलीला का प्रभाव भी अल्मोड़ा नगर की रामलीला में पड़ा। वर्तमान में अल्मोड़ा नगर की रामलीला ने देश के विभिन्न भागों में ख्याति अर्जित की है। सांस्कृतिक संस्था श्री लक्ष्मी भण्डार को देश के कुछ प्रान्तों में रामलीला मंचन के लिए आमंत्रित किया गया, जहां अल्मोड़ा बद्रेश्वर की रामलीला स्वतंत्रता के बाद नन्दादेवी में मंचित होने लगी। अल्मोड़ा की रामलीला की यह भी विशेषता रही है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायी रामलीला के पात्र होते हैं।
रावण का पुतला होता बेहद खास-
वैसे तो 1860 में रामलीला मंचन का श्री गणेश होने के साथ ही अल्मोड़ा में दशहरा सामुहिक रूप से मनाने की परम्परा शुरू हो चुकी थी परन्तु दशहरे का कोई आकर्षक स्वरूप नहीं बन सका था। उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में नगर में कभी-कभी तीन पुतले रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के बनने के उदाहरण मिलते हैं पर बद्रेश्वर मन्दिर रामलीला में प्राय: रावण का पुतला बनाया जाता रहा। यह पुतला कभी-कभी 40 फिट लम्बा बनता तो कभी लम्बाई 25-30 फिट तक रखी जाती है। विजय दशमी पर इसका दहन बद्रेश्वर में किया जाता है। बद्रेश्वर की रामलीला नन्दोदेवी में स्थानान्तरित होने के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर रावण का पुतला लगातार बनता रहा। इसका दहन दशहरे के रोज बद्रेश्वर या इसके निकट किया जाता रहा। पुतले की लम्बाई अपेक्षाकृत अधिक (20 से 30 फिट) रखी जाती। परम्परागत मार्ग से पुतले का भ्रमण होता और फिर दहन किया जाता।
वर्तमान में भी अल्मोड़ा दशहरे की है काफी धूम-
वर्तमान में अल्मोड़ा दशहरे का व्यापक स्वरूप बना हुआ है। इसे एक महोत्वस के रूप में विकसित करने में दर्जनों कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संस्कृति प्रेमियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1975 तक मात्र रावण का पुतला बनता था। उस दौर में कुछ अन्य स्थानों में भी रामलीला मंचित की जाने लगी। 1976 में मल्ली बाजार (मुरली मनोहर) के कलाकारों द्वारा मेघनाद का आकर्षक पुतला बनाकर नई शुरूआत की। प्रसिद्ध कलाकार स्व0 अमरनाथ वर्मा जो रावण पुतला निर्माण प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते थे, उन्हें संयोजक बनाकर नई परम्परा की शुरूआत हुई। मुरली मनोहर के कलाकार विजय दशमी को मेघनाद का पुतला रावण के निर्धारित स्थल पर ले आए। दोनों पुतले परम्परागत मार्ग से एक साथ घूमे। उनका दहन भी एक साथ हुआ है। अगले वर्ष जौहरी मोहल्ले के कलाकारों ने कुम्भकर्ण का पुतला बनाकर दशहरे के रोज रावण-मेघनाद के साथ खड़ा किया, फिर वहीं क्रम दोहराया गया। मेघनाद, कुम्भकर्ण के पुतले बनने के बाद से ही इन पुतलों से जुड़े लोगों की समिति बनाई गई।
अल्मोड़ा के इस दशहरा महोत्सव ने उत्तर भारत के प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव के तौर पर बनाई विशिष्ट पहचान-
इन पंक्तियों के लेखक को शुरुआत दौर 1976 से इस विशिष्ट आयोजन से वर्षों तक सक्रिय तौर पर सम्बद्ध रहने का सुअवसर मिला। इस आयोजन का तत्कालीन राष्ट्रीय, जनपदों से प्रकाशित साप्ताहिकों और उ.प्र. के समाचार पत्रों के मार्फत व्यापक प्रचार किया गया। पांच महीने से पूर्व से इस आयोजन की बैठकें होती। सम्पूर्ण नगर एक सूत्र में बंध जाता। 1983-84 तक अल्मोड़ा के इस दशहरा महोत्सव ने उत्तर भारत के प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव के तौर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना ली। सभी धर्मों के अनुयायी इसमें सक्रिय तौर पर जोड़े गये। कार्यकारिणी के महत्वपूर्ण पद इन्हें खास तौर पर देकर दशहरा महोत्सव को भारतीय राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप अनेकता में एकता का स्वरूप प्रदान किया गया। 1994-95 तक इसमें संयोजक (अध्यक्ष) पद पर अमरनाथ वर्मा, हरीश जोशी और दिनेश गोयल रहे। अमरनाथ वर्मा और हरीश जोशी कई बार इस आयोजन के मुखिया रहे। इसमें तत्कालीन तीन पीढ़ियां जुड़ी हुई थी।
आने वाली पीढ़ी को भी जाननी होगी इस महोत्सव की खासियत-
पीढ़ियों के आधार पर आंका जाय तो दशहरा महोत्सव को व्यापकता देने वाले कई प्रतिभायें हमारे बीच नहीं रही। इससे सक्रिय तौर पर सम्बद्ध कई लोग वरिष्ठ नागरिक और वृद्ध हो चले हैं। रामलीला मंचन और दशहरा महोत्सव एक दूसरे के पूरक होने से इन आयोजनों के प्रति संस्कृति प्रेमियों और कलाकारों को जोड़ना निहायत जरूरी है। दशहरा महोत्सव आने वाली पीढ़ी के लिए भी बेहद खास और जरूरी है।