आज चीर बंधन के साथ होली पर्व की शुरुआत हो गई है। होली का त्योहार रंगों और खुशियों का संगम है, लेकिन गुजिया के बिना यह उत्सव अधूरा सा लगता है।
गुजिया का खास महत्व
उत्तराखंड में होली के त्योहार पर गुजिया सबसे प्रमुख और लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई है, जो राज्य के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही क्षेत्रों में हर्षोल्लास के साथ बनाई जाती है। होली के अवसर पर मावा (खोया), सूखे मेवों और नारियल से भरी यह तली हुई मिठाई हर घर की रसोइयों और बाजारों में मुख्य आकर्षण होती है। होली पर उत्तराखंड में गुजिया बनाना एक परंपरा है, जिसे लोग मिल-बांटकर खाते हैं और मेहमानों को परोसते हैं। इसमें मुख्य रूप से मावा (खोया), नारियल, काली मिर्च और मेवों (जैसे बादाम, काजू, किशमिश) का उपयोग किया जाता है। देहरादून, हल्द्वानी, अल्मोड़ा जैसे शहरों में होली के समय गुजिया की भारी मांग रहती है, और वहां विशेष रूप से ताजी और गर्म गुजिया उपलब्ध होती हैं। अल्मोड़ा की गुजिया की देश विदेश में काफी लोकप्रिय है।
जानें इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार गुजिया की शुरुआत 13वीं से 17वीं सदी के बीच मानी जाती है। 13वीं सदी में गुजिया जैसी मिठाई का जिक्र मिलता है, लेकिन उस समय इसे घी में तला नहीं जाता था। उस दौर में गेहूं के आटे की छोटी लोइयों में गुड़ और शहद भरकर धूप में सुखाया जाता था। यह मिठाई बहुत साधारण थी और खासतौर पर बसंत ऋतु में फसल कटने के समय बनाई जाती थी। धीरे-धीरे यह परंपरा होली के त्योहार से जुड़ गई।
गुजिया की सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान
गुजिया होली का हस्ताक्षर व्यंजन है। जैसे दिवाली में दीयों का महत्व है, वैसे ही होली में गुजिया का। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही एक परंपरा है, जो परिवारों को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
रिश्तों में मिठास का प्रतीक
होली का त्योहार गिले-शिकवे मिटाने का दिन है। जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाने के बाद गुजिया खिलाते हैं, तो यह सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक बन जाता है। इसकी मिठास कड़वाहट को खत्म करने का काम करती है।
सामाजिक मेल-जोल
गुजिया बनाना कोई अकेला काम नहीं है। पारंपरिक रूप से घर की महिलाएँ और बच्चे मिलकर इसे बनाते हैं। कोई आटा गूंथता है, कोई भरावन (Stuffing) तैयार करता है, तो कोई इसे सांचे में ढालता है। यह प्रक्रिया परिवार के सदस्यों के बीच धैर्य और टीम वर्क को बढ़ावा देती है।
ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य
होली वसंत ऋतु के आगमन और सर्दियों की विदाई का समय है।
• ऊर्जा का स्रोत: गुजिया में इस्तेमाल होने वाले सूखे मेवे, खोया और सूजी शरीर को वह ऊर्जा देते हैं जिसकी मौसम बदलने के दौरान जरूरत होती है।
• शुद्धता: घर पर बनी गुजिया मिलावट रहित और शुद्ध मानी जाती है, जो मेहमानों के स्वागत के लिए सबसे उत्तम उपहार है।
विविधता में एकता
गुजिया के अलग-अलग रूप पूरे भारत में पाए जाते हैं।
• महाराष्ट्र में इसे करंजी कहा जाता है।
• बिहार में इसे पेड़किया के नाम से जाना जाता है।
• दक्षिण भारत में इसे कज्जिकयालु कहते हैं। नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन इसके पीछे का प्यार और उल्लास एक ही है।
• उत्तराखंड में इसे गुजिया ही कहा जाता है। जो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में होली के दौरान लोकप्रिय है। मैदा, मावा, और नारियल के साथ तैयार की जाने वाली यह मिठाई उत्तराखंड की पारंपरिक होली की मुख्य पहचान है।
जानें बनाने की विधि
आटा तैयार करना
• मैदे में घी (मोयन) डालकर अच्छी तरह मिलाएँ। जब मैदा मुट्ठी में बंधने लगे, तो समझिये मोयन सही है।
• थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर सख्त आटा गूंथ लें। इसे गीले कपड़े से ढककर 20-30 मिनट के लिए छोड़ दें।
भरावन तैयार करना
• एक कड़ाही में सूजी को हल्का सुनहरा होने तक भूनें और निकाल लें।
• अब उसी कड़ाही में मावा को धीमी आंच पर भूनें जब तक वह हल्का घी न छोड़ने लगे।
• मावा थोड़ा ठंडा होने पर इसमें भुनी सूजी, चीनी, मेवे, नारियल और इलायची पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लें। (ध्यान रहे: गर्म मावे में चीनी न डालें, वरना वह पानी छोड़ देगा)।
बेलना और भरना
• आटे की छोटी लोइयां तोड़ें और उन्हें पूरी की तरह पतला बेल लें।
• सांचे (Mould) पर बेली हुई पूरी रखें, बीच में 1-2 चम्मच भरावन डालें।
• किनारों पर हल्का सा पानी लगाएँ (ताकि तलते समय ये खुले नहीं) और सांचे को दबाकर बंद कर दें।
तलना
• कड़ाही में घी या तेल गरम करें। आंच को धीमी से मध्यम (Low-Medium) रखें।
• गुजिया को सुनहरा होने तक अलट-पलट कर तलें।