23 जनवरी: बसंत पंचमी 2026: बसंत पंचमी का महापर्व आज, जानें माँ सरस्वती के जन्म से जुड़ी प्रचलित कथा व शुभ मुहूर्त

आज 23 जनवरी 2026 है। आज बसंत पंचमी का त्यौहार है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को साल की सबसे शुभ तिथियों में गिना गया है। माघ शुक्ल की पंचमी तिथि को विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की उपासना की जाती है। उपासना के इसी पर्व को बसंत पंचमी कहते हैं। बसंत पंचमी को पारंपरिक रूप से बच्चों की शिक्षा के लिए काफी शुभ माना गया है। इसलिए देश के अनेक भागों में इस दिन बच्चों की पढाई-लिखाई का श्रीगणेश किया जाता है।

बसंत पंचमी का त्यौहार

बसंत पंचमी के दिन को देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं । माघ शुक्ल पंचमी उदया तिथि के अनुसार इस साल बसंत पंचमी 14 फरवरी को मनाई जाएगी। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है । आज यानि बसंत पंचमी से बसंतोत्सव की शुरुआत होती है, जो होली तक चलता है । बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है । बसंत पंचमी को श्रीपंचमी और सरस्वती पंचमी के नाम से भी जाना जाता है । सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन ज्ञान, कला की देवी माता सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ था। बसंत पंचमी को साल के अबूझ मुहूर्तों में से एक माना जाता है। इसी के कारण इसे दिन बिना मुहूर्त देखें शादी-विवाह, मुंडन, छेदन, गृह प्रवेश सहित अन्य शुभ काम किए जाते हैं। इसके अलावा कुछ काम नहीं किए जाते हैं।

मां को पीले वस्त्र करें अर्पित

बसंत पंचमी वाले दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर साफ पीले या सफेद रंग का वस्त्र पहनें। उसके बाद सरस्वती पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थान पर मां सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। मां सरस्वती को गंगाजल से स्नान कराएं। फिर उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं। इसके बाद पीले फूल, अक्षत, सफेद चंदन या पीले रंग की रोली, पीला गुलाल, धूप, दीप, गंध आदि अर्पित करें। सरस्वती माता को गेंदे के फूल की माला पहनाएं। माता को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद सरस्वती वंदना एवं मंत्र से मां सरस्वती की पूजा करें। आप चाहें तो पूजा के समय सरस्वती कवच का पाठ भी कर सकते हैं।

जानें कथा

कथानुसार सृष्टि रचना के दौरान भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की । ब्रह्माजी अपने सृजन से असंतुष्ट थे । उन्हें लगा कि कुछ कमी है । विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल का छिड़काव किया । पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही कंपन होने लगा । और इसके बाद अद्भुत शक्ति प्रकट हुई । यह शक्ति चतुर्भुजी सुंदर स्त्री थी । जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरे हाथ में वर मुद्रा थी । अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी । ब्रह्माजी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया । तो देवी ने जैसे ही वीणा बजाई । संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हुई । जलधारा में कोलाहल व्याप्त हुआ । पवन चलने से सरसराहट होने लगी । तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा ।

माँ की वंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌॥
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

जानें शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, मास मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 23 जनवरी को तड़के 02.28 बजे प्रारंभ हो रही है, जो 24 जनवरी को को तड़के 01.46 बजे समाप्त होगी। ऐसे में उदिया तिथि के आधार पर बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा। बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 23 जनवरी को सुबह 7 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक का है।