कवि डॉ. ललित योगी की भावों को उद्वेलित करने वाली रचना, समंदर को भला कोई, समझ पाया है क्या?

समंदर को भला कोई,
समझ पाया है क्या?
बादलों के रुख को कोई
पहचान पाया है क्या?
समंदर से भरे हैं हम,
और दिल, समंदर सा है!
समंदर के राज को
भला कोई पढ़ पाया क्या? समंदर…

बहुत इंसान मिले हैं हर रोज,
हर रोज इक नया चेहरा गढ़ा।
हैं वे सभी चंचल-बहरूपिये,
नहीं उनमें एक भी गहरा।।
मौसम मिजाज हो जिनका
उन्हें कोई बदल पाया क्या?
जो हो नहीं सकते अटल कभी,
उन्हें कोई बदल पाया क्या? समंदर..

दिन बदले,दिन-पर-दिन
और बदलेंगे क्षण ऐसे ही।
बहता समय है अरे भय्या,
इसे कोई थाम पाया क्या?
मन हो जिनका खाली,
और अनमना सा सबकुछ।
वीरान-बंजर कमरों में भी
भला कोई रह पाया क्या? समंदर…

योगी समंदर से भरे हम हैं,
करें बातें समंदर सी गहरी।
यह महज़ लफ्ज ही नहीं,
शामिल इसमें बात युगों की।।
नदियों सा शोर हो बसा जिनमें,
उन्हें कोई चुप करा पाया क्या?
भाव शून्य,चेहरे को भी भला,
कोई रट-समझ पाया क्या? समंदर….

  • डॉ ललित योगी