इन दिनों बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन पर बनी फिल्म हनुमान अंश काफी चर्चा में बनी हुई है। इस आध्यात्मिक फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया है। यह फिल्म 7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई थी और इसे दर्शकों की ओर से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है।
दर्शकों का मिल रहा प्यार
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक’टॉक्सिक’ और ‘आवारापन 2’ जैसी बड़ी फिल्मों की रफ्तार जहां धीमी पड़ रही है, वहीं बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने चौथे हफ्ते में हैरान करने वाला कमबैक किया है। फिल्म की शुरुआत बेहद सुस्त रही थी। पहले दिन इसने सिर्फ 8 से 10 लाख रुपये का बिजनेस किया था। हालांकि, दर्शकों की तारीफों और मजबूत ‘वर्ड ऑफ माउथ’ के दम पर फिल्म ने रफ्तार पकड़ी। सैकनिल्क के मुताबिक, फिल्म ने 23वें दिन 9.25 करोड़ का कलेक्शन किया। फिल्म को 4,137 शोज मिले। फिल्म को 53 परसेंट ऑक्यूपेंसी मिली। फिल्म ने टोटल 27.38 करोड़ का कलेक्शन किया।
फिल्म ‘हनुमान अंश’ का जादू
उत्तर भारत के थिएटर्स में फिल्म का प्रदर्शन काफी मजबूत देखा जा रहा है। हनुमान अंश 2026 में बनी एक हिंदी भाषा की भक्तिमय ड्रामा फिल्म है, जिसे विशाल चतुर्वेदी ने लिखा और निर्देशित किया है। यह फिल्म बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन पर आधारित है, जिन्हें महाराज-जी के नाम से जाना जाता है। फिल्म में शोभिनव सत्या लीड रोल में हैं। उनके अलावा चंदन आनंद, विहान शेडगे, पूर्णिमा तिवार, अनिल रस्तोगी, गुल्शन पांडे, मनीष चौधरी जैसे स्टार्स नजर आए हैं। फिल्म की कहानी नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित है। उनकी आध्यात्मिक यात्रा को दिखाया गया है। फिल्म ‘हनुमान अंश’ की कहानी महान संत नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित है। फिल्म में उनके बचपन से लेकर संत के रूप में उनकी पहचान बनने तक के सफर को दिखाया गया है। कहानी बच्चे लक्ष्मीनारायण से शुरू होती है, जिन्हें आगे चलकर भक्त नीम करोली बाबा या ‘महाराज जी’ के नाम से जानने लगते हैं। उनके मन में ईश्वर को खोजने की इच्छा पैदा होती है। इसी मासूम जिज्ञासा के चलते वो घर छोड़कर ईश्वर की तलाश में निकल पड़ते हैं। फिल्म में उनकी कठिन आध्यात्मिक यात्रा दिखाई गई है। वो जंगलों, नदियों, पहाड़ों और अलग-अलग मंदिरों में भटकते हैं। इस दौरान मौन, आत्म-अनुशासन और वैराग्य को अपनाते हुए वो प्रभु श्रीराम और हनुमान जी की भक्ति में लीन हो जाते हैं। सालों की साधना और आत्ममंथन के बाद उन्हें ये एहसास होता है कि ईश्वर को पाने का रास्ता सिर्फ एकांत या जंगलों से होकर नहीं गुजरता, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा में भी भगवान का वास है। इसके बाद वो अपना जीवन गरीबों, भूखों और दुखी लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं।