72 घंटे में अकेले ही 300 चीनी सैनिकों को ढेर करने वाले राइफलमैन जसवंत सिंह की आज है पुण्यतिथि, “बाबा जसवंत” के नाम से सम्मान देती है भारतीय सेना

उत्तराखंड के वीर सपूत महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत की आज 59वीं पुण्यतिथि है। कहा जाता है कि भारतीय सेना का यह राइफल मैन आज भी सरहद पर तैनात हैं। भारतीय सेना जाबांज जसवंत सिंह को “बाबा जसवंत” के नाम से सम्मान देती है। उनके नाम के आगे कभी स्वर्गीय नहीं लिखा जाता है।

आज भी लगता है ‌रोज शाम को उनका बिस्तर

शहीद जसवंत सिंह के नाम के आगे आज भी स्वर्गीय नहीं लगाया जाता। बाकायदा उन्‍हें आज भी पोस्ट और प्रमोशन दिया जाता है। यहां तक क‍ि उन्हें छुट‍ि्टयां भी दी जाती हैं। जिस पोस्ट पर वह शहीद हुए थे भारत सरकार ने उसे ‘जसवंतगढ़’ नाम दिया है। उनकी याद में गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट के मुख्यालय लैंसडौन में ‘जसवंत द्वार’ बनाया गया है। बहादूर जवान के सम्मान में उनका मंद‍िर बनाया गया है। यह स्थान भारतीय सेना के लिए किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। जहां उनकी सेवा में भारतीय सेना के पांच जवान द‍िन रात लगे रहते हैं। वे उनकी वर्दी को प्रेस करते हैं। जूते पॉल‍िश करते हैं और सुबह शाम नाश्‍ता और खाना देने के साथ रात को सोने के लिए ब‍िस्‍तर लगाते हैं।

हिमालय सा अडिग जसवंत सिंह, दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए

1962 की जंग में जसवंत स‍िंह चीन के सामने हिमालय सा अडिग होकर 72 घंटों तक खड़े रहे। 1962 का भारत-चीन युद्ध अंतिम चरण में था। 14,000 फीट की ऊंचाई पर करीब 1000 किलोमीटर क्षेत्र में फैली अरुणाचल प्रदेश स्थित भारत-चीन सीमा युद्ध का मैदान बनी थी। इस इलाके में जाने से लोगों की रूह भी कांपती है लेकिन वहां हमारे सैनिक लड़ रहे थे। चीनी सैनिक भारत की जमीन पर कब्जा करते हुए हिमालय की सीमा को पार कर अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक आ पहुंच थे। बीच लड़ाई में ही संसाधन और जवानों की कमी का हवाला देते हुए बटालियन को वापस बुला लिया गया। लेकिन जसवंत सिंह ने वहीं रहने और चीनी सैनिकों का मुकाबला करने का फैसला किया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश की मोनपा जनजाति की दो लड़कियों नूरा और सेला की मदद से फायरिंग ग्राउंड बनाया और तीन स्थानों पर मशीनगन और टैंक रखे। उन्होंने ऐसा चीनी सैनिकों को भ्रम में रखने के लिए किया ताकि चीनी सैनिक यह समझते रहे कि भारतीय सेना बड़ी संख्या में है और तीनों स्थान से हमला कर रही है। नूरा और सेला के साथ-साथ जसवंत सिंह तीनों जगह पर जा-जाकर हमला करते रहे। इस तरह वे 72 घंटे यानी तीन दिनों तक चीनी सैनिकों को चकमा देने में कामयाब रहे इस दौरान उन्होंने 300 चीनी सैनिकों को‌ मार‌ गिराया।

चीनी सेना का कमांडर जसवंत स‍िंह की तबाही से इतना नारज था क‍ि वो उनका सिर काटकर ले गया

72 घंटों के बाद दुर्भाग्य से उनको राशन की आपूर्ति करने वाले शख्स को चीनी सैनिकों ने पकड़ लिया। उसने चीनि‍यों को जसवंत सिंह रावत के बारे में सारी बातें बता दीं। ज‍िसके बाद चीनी सैनिकों ने 17 नवंबर, 1962 को चारों तरफ से जसवंत सिंह को घेर ल‍िया। हमले में सेला मारी गई जबक‍ि नूरा को चीनी सैनिकों ने जिंदा पकड़ लिया। जब जसवंत सिंह को अहसास हो गया कि उनको पकड़ लिया जाएगा तो उन्होंने युद्धबंदी बनने से बचने के लिए एक गोली खुद को मार ली। चीनी सेना का कमांडर जसवंत स‍िंह की तबाही से इतना नारज था क‍ि वो उनका सिर काटकर ले गया। लेक‍िन बाद में चीनी सेना भी जसवंत स‍िंह के पराक्रम से इतनी प्रभावि‍त हुई क‍ि युद्ध के बाद चीनी सेना ने उनके सिर को ससम्मान लौटा दिया। चीनी सेना ने उनकी पीतल की बनी प्रतिमा भी भेंट की।