उत्तराखंड से जुड़ी खबर सामने आई है। उत्तराखंड के अखिल भारतीय ऋ आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)-ऋषिकेश में एक नई पहल की शुरुआत हुई है।
दुनिया की पहली ‘मिनिमली इनवेसिव ऑटोप्सी’ तकनीक की शुरुआत
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां पोस्टमार्टम के लिए अब शरीर की चीड़फाड़ नहीं होगी। एम्स में फॉरेंसिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक नयी पहल हुई है। इसके लिए यहां विश्व की पहली न्यूनतम इनवेसिव शव परीक्षण विधि (मिनिमली इनवेसिव ऑटोप्सी) शुरू की गई है। इससे अपराध परीक्षण को और सटीकता प्रदान करेगा। साथ ही इस प्रोसेस में मरे इंसानी शरीर का सम्मानजनक तरीके से पोस्टमॉर्टम किया जाएगा।
ऑटोप्सी प्रोसिजर रहेगा ज्यादा मानवीय और सम्मानजनक
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस संबंध में एम्स-ऋषिकेश के विधि विज्ञान (फॉरेंसिक) विभाग के अध्यक्ष बिनय कुमार बस्तिया ने इसकी पूरी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि नई टेक्नोलॉजी में शव के आंतरिक अंगों की जांच के लिए मृत शरीर पर तीन जगहों पर करीब दो-दो सेंटीमीटर के छेद किए जाएंगे। इसके बाद इन छेदों में लैप्रोस्कोपिक दूरबीन डाली जाएगी। फिर सीटी स्कैन से इमेजरी तैयार की जाएगी, जिसे अदालत को सीधे सबूत के तौर पर दे दिया जाएगा। बताया कि 14 अप्रैल को यह तकनीक शुरू हुई। इसमें उच्च-रिज़ॉल्यूशन लैप्रोस्कोपिक कैमरों के इस्तेमाल से आंतरिक चोटों और नुकसान का अधिक सटीकता से पता लगाया जा सकता है, जबकि यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामलों में यह प्रोसेस अधिक सम्मानजनक और विस्तृत जांच की सुविधा देगा। जिससे अहम सबूत जुटाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया को पूरी तरह से रिकॉर्ड किया जाता है जिससे कानूनी जांच के लिए पारदर्शी दस्तावेजीकरण और चिकित्सा शिक्षा के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध होती है। अब तक पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को ‘हार्ड कॉपी’ में अदालत तक पहुंचाया जाता था। अदालतों में पेश करने के लिए ये डिजिटल सबूत ज्यादा भरोसेमंद और साफ-सुथरे होते हैं।