नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य के दूरदराज और पर्वतीय इलाकों में रह रहे बुजुर्गों को बुनियादी सुविधाएं न मिलने और बच्चों को खराब भोजन परोसे जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है।
की यह सुनवाई
जिस पर हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सरकार को बुजुर्गों की देखरेख, सुरक्षा और सुविधाओं के संबंध में चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का अंतिम निर्देश दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष अधिवक्ता दीपा आर्या की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में पर्वतीय जिलों की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति का हवाला देते हुए गंभीर मुद्दे उठाए। भारी पलायन के कारण उत्तराखंड के कई सीमांत और ग्रामीण क्षेत्रों में केवल बुजुर्ग ही बचे हैं। वे पैतृक गांवों में बिल्कुल अकेले रह रहे हैं, जहाँ उन्हें न तो उचित स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं और न ही सुरक्षा। वे अपने मौलिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को समय पर बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इतना ही नहीं, स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) में भारी लापरवाही बरती जा रही है। कई जगहों पर बच्चों को एक्सपायरी डेट (अवधि पार) का भोजन परोसा जा रहा है, जो उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
RTI में भी छिपाई जानकारी
याचिकाकर्ता ने अदालत को अवगत कराया कि इस संवेदनशील मामले पर जब सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत विभिन्न जिलों से बुजुर्गों की स्थिति और उन्हें दी जा रही सुविधाओं के बारे में जानकारी मांगी गई, तो प्रशासन द्वारा जानकारी देने से इनकार कर दिया गया या टालमटोल की गई। सूचना न देना यह दर्शाता है कि धरातल पर स्थिति चिंताजनक है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस पूरे मामले को अत्यंत संवेदनशील और गंभीर माना है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बुजुर्गों और बच्चों के अधिकारों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।