उत्तराखंड: “माँ-बाप का सम्मान नहीं, तो यहां जगह नहीं”, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुरक्षा मांगने आए प्रेमी जोड़े को लगाई कड़ी फटकार, जानें मामला

​उत्तराखंड से जुड़ी खबर सामने आई है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने घर से भागकर शादी करने वाले एक बालिग जोड़े की सुरक्षा याचिका पर सुनवाई की और सख्त टिप्पणी की है।

अदालत ने लगाई फटकार

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नैनीताल हाईकोर्ट ने न केवल याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाई, बल्कि यह भी सवाल किया कि क्या बालिग होने का अर्थ यह है कि बच्चों के जीवन में माता-पिता की राय का कोई मूल्य नहीं रह गया है? मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस थपलियाल ने समाज में गिरते पारिवारिक मूल्यों पर गहरी चिंता व्यक्त की। ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान जस्टिस थपलियाल जोड़े पर काफी नाराज दिखे। उन्होंने कहा:
​”यह किस तरह की शादी है? सिर्फ इसलिए कि वे बालिग हैं, क्या वे कुछ भी करेंगे? जिन माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया और इतनी मुश्किलों से पाल-पोसकर बड़ा किया, क्या उनकी कोई बात नहीं मानी जाएगी?”
अदालत ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि बच्चे माता-पिता से सलाह तक नहीं लेते और सीधे अदालत आकर उन्हीं पर धमकी देने का आरोप लगा देते हैं। जज ने यहाँ तक कह दिया कि, “ऐसे लोगों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते। 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ मामला खारिज कर दूँगा, अपने माता-पिता के पास जाओ।”

​जानें क्या है पूरा मामला?

​एक 18 वर्षीय युवती और 21 वर्षीय युवक ने घर से भागकर मंदिर में विवाह कर लिया था। जोड़े ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दावा किया कि उनके परिवारवाले इस शादी को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है। उन्होंने कोर्ट से पुलिस सुरक्षा की गुहार लगाई थी।

जज बेटी की माँ से करना चाहते थे बात

​सुनवाई के दौरान कोर्ट इतना भावुक और सख्त दिखा कि न्यायमूर्ति ने लड़की से उसकी माँ का फोन नंबर भी माँगा। उन्होंने कहा, “हम तुम्हारी माँ से बात करेंगे और उन्हें कम से कम यह बताएंगे कि उनकी बेटी यहाँ सुरक्षित है। कल को अगर वे हमसे पूछेंगी कि हमने इस शादी की अनुमति कैसे दे दी, तो हम क्या जवाब देंगे?” हालाँकि, बाद में कोर्ट ने सीधे तौर पर माता-पिता से बात नहीं की।

कानूनी कर्तव्य और अंतिम निर्णय

​शुरुआती नाराजगी और फटकार के बावजूद, अदालत ने कानून के दायरे को ध्यान में रखा। कोर्ट ने माना कि राज्य की एजेंसी होने के नाते पुलिस का यह प्राथमिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक की जान-माल की रक्षा करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत नाराजगी अपनी जगह है, लेकिन कानूनन सुरक्षा प्रदान करना पुलिस की जिम्मेदारी है।