आज 16 नवंबर 2024 है। आज वृश्चिक संक्रांति है।
पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष पक्ष की अष्टमी तिथि यानी 16 नवंबर को सूर्य तुला राशि से निकलकर वृश्चिक राशि में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए इस संक्रांति को राशि के अनुसार वृश्चिक संक्रांति के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में संक्रांति तिथि का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य देव एक राशि में 30 दिन तक रहते हैं। ग्रहों के राजा सूर्य एक राशि से जब दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को संक्रांति कहते हैं।
वृश्चिक संक्रांति में सूर्य का पूजन
अन्य संक्रांति की तरह वृश्चिक सक्रांति में भी सूर्य पूजन लाभदायी होता है। इस काल में मनुष्य को सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। फिर स्नान कर तांबे के पात्र में शुद्ध पानी भरकर उसमें लाल चंदन मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। रोली, सिंदूर व हल्दी मिला जल चढ़ाने का भी विधान है। सूर्य के लिए दीपक जलाते समय घी में भी लाल चंदन मिलाना चाहिए।
जानें वृश्चिक संक्रांति का महत्व
वृश्चिक संक्रांति के दिन श्राद्ध और पितृ तर्पण करना महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। सूर्य देव की पूजा करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। कहते हैं सूर्य देव को जल अर्पित करने से जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं। तांबे के लोटे में जल लाल चंदन लाल फूल और कुमकुम मिलाकर सूर्य देव को अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा पवित्र नदी में स्नान और दान करना भी बहुत ही शुभ माना जाता है। आप चाहें तो ब्राह्मण को गाय का दान भी कर सकते हैं। कहते हैं ऐसा करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य अच्छे स्वास्थ्य का आनंद उठाता है। सूर्य देव की पूजा करने से पराक्रम, बल,तेज, यश और कीर्ति मिलती है।
जानें शुभ मुहूर्त
सूर्य देव मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी 16 नवंबर को सुबह 07 बजकर 41 मिनट पर वृश्चिक राशि में गोचर करेंगे। इस दिन पुण्य काल सुबह 06 बजकर 45 मिनट से लेकर सुबह 07 बजकर 41 मिनट तक है। वहीं, महा पुण्य काल सुबह 06 बजकर 45 मिनट से लेकर सुबह 07 बजकर 41 मिनट तक है।