28 फरवरी: भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित नृसिंह द्वादशी आज, जानें होली से पूर्व क्यों मनाया जाता है यह पर्व

आज 28 फरवरी 2026 है। आज नृसिंह द्वादशी है। हर साल फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को नरसिंह द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित होता है।

खास है महत्व

नरसिंह द्वादशी भगवान विष्णु के सिंह-पुरुष रूप, भगवान नरसिंह को समर्पित है। नरसिंह द्वादशी हिंदू चंद्र पंचांग के फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष के बारहवें दिन पड़ती है। नरसिंह द्वादशी व्रत हिंदू धर्म में सबसे लोकप्रिय व्रतों में से एक है, जो भक्तों के सभी पापों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। नरसिंह द्वादशी भगवान नरसिंह की पूजा के लिए समर्पित है। होली के ठीक कुछ दिन पहले आने वाला यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत के उत्सव है।

जानें शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 28 फरवरी को नरसिंह द्वादशी का व्रत रखा जाएगा। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 27 फरवरी 2026 को रात्रि 10 बजकर 32 मिनट पर प्रारंभ होगी और 28 फरवरी 2026 को रात 08 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी।
• उदया तिथि के अनुसार मुख्य व्रत 28 फरवरी 2026 को रखा जाएगा और पारण 1 मार्च 2026 की सुबह किया जाएगा।
• द्वादशी पारण का समय 1 मार्च 2026 को प्रातः 06 बजकर 21 मिनट से 08 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।

जानें पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार असुर राजा हिरण्यकश्यप अपने भाई की मृत्यु का बदला भगवान विष्णु से लेना चाहता था। उसे भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था जिससे वह लगभग अजेय हो गया था। हालांकि, हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। इसलिए, हिरण्यकश्यप ने उसे कई बार मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार असफल रहा। एक बार हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद से भगवान विष्णु के अस्तित्व का प्रमाण मांगा, तो प्रहलाद ने एक खंभे की ओर इशारा किया। क्रोधित हिरण्यकश्यप ने अपनी गदा खंभे पर जोरदार प्रहार किया। अचानक, भगवान विष्णु नरसिंह के भयंकर रूप में खंभे से प्रकट हुए और संध्या समय, द्वार की चौखट पर, न मानव न पशु रूप में, न अंदर न बाहर, न दिन न रात ऐसे वरदानों की शर्तों के बीच दैत्यराज का वध कर दिया। इसी घटना को धर्म की अधर्म पर विजय के रूप में देखा जाता है। यही कथा आगे चलकर होलिका दहन और होली पर्व से भी जुड़ती है।