26 अप्रैल: जानें भगवान महावीर स्वामी को कब और कैसे प्राप्त हुआ था कैवल्य ज्ञान, जानें इसके बारे में

आज 26 अप्रैल 2026 है। आज भगवान महावीर स्वामी का कैवल्य ज्ञान दिवस (केवल ज्ञान) है। यह दिवस वैशाख शुक्ल दशमी को मनाया जाता है, जब 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में उन्हें पूर्ण ज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त हुआ था। यह ज्ञान ऋजुपालिका नदी के तट पर एक शाल वृक्ष के नीचे ‘गोदोहासन’ मुद्रा में प्राप्त हुआ था। इसे ज्ञान कल्याणक के रूप में पवित्रता से मनाया जाता है। 

खास है महत्व

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर व अंतिम, सत्य और अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर के अनुयायी दुनियाभर में हैं। भगवान महावीर का जन्म लगभग 2600 वर्ष पूर्व राजा सिद्धार्थ व महारानी त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के पावन दिन हुआ था। इसलिए हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को महावीर जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 26 अप्रैल को मनाया जाएगा।

जानें महावीर स्वामी को कैसे प्राप्त हुआ कैवल्य ज्ञान

भगवान महावीर ने 12 साल तक मौन तपस्या तथा गहन ध्‍यान किया। अन्त में उन्हें ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त हुआ।  उन्होंने ‘कैवल्य ज्ञान’ की जिस ऊंचाई को छुआ था वह अतुलनीय है। मोक्ष की धारणा वैदिक ऋषियों से आई है। भगवान बुद्ध को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन साधना में बिताना पड़ा। महावीर को कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करनी पड़ी और ऋषियों को समाधि (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए योग और ध्यान की कठिन साधनाओं को पार करना पड़ता है। अत: सिद्ध हुआ कि मोक्ष को प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। मोक्ष प्राप्त करने से व्यक्ति जन्म मरण के चक्र से छुटकर भगवान के समान हो जाता है। मोक्ष मिलना आसान नहीं। दुनिया में सब कुछ आसानी से मिल सकता है, लेकिन खुद को पाना आसान नहीं। खुद को पाने का मतलब है कि सभी तरह के बंधनों से मुक्ति।

क्या होता है कैवल्य ज्ञान?

वह अंतरिक्ष के उस सन्नाटे की तरह है जिसमें किसी भी पदार्थ की उपस्थिति नहीं हो सकती। जहां न ध्वनि है और न ही ऊर्जा। केवल शुद्ध आत्मतत्व। हिन्दू धर्म में कैवल्य ज्ञान को स्थितप्रज्ञ, प्रज्ञा कहते हैं। यह मोक्ष या समाधि की एक अवस्था होती है। समाधि समयातित है जिसे मोक्ष कहा जाता है। इस मोक्ष को ही जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में संबोधी एवं निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहा गया है। इसके कई स्तर होते हैं। इसे मन के पार अमनी दशा कहते हैं।