नैनीताल: नैनीताल हाईकोर्ट शिफ्टिंग‌ पर बढ़ा विवाद, वकीलों का सुप्रीम कोर्ट का रुख, वन भूमि और मॉनेटाइजेशन पर खड़े किए सवाल

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ वकीलों ने विरोध तेज कर दिया है।

किया विरोध

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस पर अधिवक्ताओं ने इस शिफ्टिंग के विरोध में कानूनी और प्रशासनिक मोर्चे पर लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया है। इस सिलसिले में अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका दायर की है और अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व केंद्रीय कानून मंत्री को ज्ञापन भेजने की तैयारी की जा रही है। इस संबंध में बीते दिनों बुधवार को नैनीताल में एक पत्रकार वार्ता आयोजित हुई। इस दौरान बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत, वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. महेंद्र पाल और अन्य वकीलों ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह गैर-कानूनी और पहाड़ विरोधी बताया।

अधिवक्ताओं ने उठाए‌ यह बिंदु
• ​वन भूमि हस्तांतरण पर सवाल: अधिवक्ताओं का कहना है कि 12 अगस्त 2026 को राज्य सरकार ने बेलबाबा (हल्द्वानी) में स्थित वन भूमि को हाईकोर्ट के लिए हस्तांतरित करने की स्वीकृति दी, जो वन संरक्षण अधिनियम के खिलाफ है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बिना राज्य सरकार ऐसा फैसला नहीं ले सकती।
• ​हाथी कॉरिडोर और पर्यावरणीय नियम: राज्य सरकार के दावों के विपरीत, केंद्रीय वन मंत्रालय ने 3 सितंबर को उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (वन) को कानून के प्रविधानों के तहत कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए हैं। अधिवक्ताओं ने कहा कि जिलाधिकारी द्वारा मई 2026 में भेजा गया भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव भी गैर-कानूनी था।
• ​निजीकरण का आरोप: पूर्व सांसद व वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. महेंद्र पाल ने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट शिफ्ट करने के बाद नैनीताल स्थित ऐतिहासिक बिल्डिंग और परिसर का ‘मॉनेटाइजेशन’ कर इसे निजी हाथों में बेचने की योजना है। सरकार हल्द्वानी में प्रॉपर्टी डीलरों को फायदा पहुंचाने के लिए यह कदम उठा रही है।
• ​मूल अवधारणा पर प्रहार: वकीलों ने कहा कि हाईकोर्ट को नैनीताल से हटाना उत्तराखंड राज्य के गठन की मूल अवधारणा और पर्वतीय पहचान के खिलाफ है।

किया स्पष्ट

अधिवक्ता रमन शाह और डॉ. कार्तिकेय हरि गुप्ता ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता खुल गया है और शीर्ष अदालत में मजबूती से पक्ष रखा जाएगा।