हवसी,दरिंदों के बीच
बेवस हो रही हैं बेटियां।
आज फिर, जाने क्यों?
जल रही हैं बेटियां।
इन रसूखदारों को कोई
सबक सिखाओ तो सही।
इन मायावियों के जाल में
आज फंस रही है बेटियां।।
बाहर ज्ञानशालाएं सी लगे,
भीतर कालिख के हैं निशान।
बड़े ही राज उगल गयी हैं ये
इन राजमंत्रियों की कोठियां।
अब न लूटे अस्मत किसी की,
अंकिताएँ फिर न जलें।
देवभूमि में न जाने क्यों?
नहीं बच पा रही हैं बेटियां।।
©डॉ ललित योगी